ज्ञान के लिए सम्पूर्ण बलिदान

ज्ञान के लिए सम्पूर्ण बलिदान Gyan ke liye sampurn balidan moral story of hindi

 

ये कहानी एक बलिदान पर आधारित कहानी है. जो की हमे ये सीख देती है की हमे केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि कभी कभी दुसरो के लिए भी जीना चाहिए. एक समय की बात जब एक बार एक दोस्त ने मुझसे एक सवाल किया की “आपको सम्पूर्ण दुनिया मैं सबसे उत्तम वास्तु कौन सी लगती है”. तो मैंने उन्हें उत्तर दिया की “ज्ञान”. क्योकि ज्ञान ही एक ऐसी वास्तु है जो की सदा ही हमारे पास रहती है.चाहे हमारे सामने कितनी भी प्रकार के संयोग या वियोग आये, पर वो हमेशा ही मेरे साथ बने रहे है और इसी कारण से मेरे सम्पूर्ण जीवन मैं सदा ही सुख और आनद के झरने बने रहे है.


चाहे लोग मेरे विरुद्ध कुछ भी बुरा भला कहे, मेरे विपरीत कितनी भी तेज हवा चले या फिर कोई भी इंसान मेरा रास्ता रोके तब भी मैं in सब बात की परवाह ना करते हुए चलता रहुगा. यदि मुझे भगवन से प्रार्थना करने का मौका मिली तो मैं भगवन से यही प्रार्थना करुगा की , hey बागवान आप मुझे सदा ही विध्या पढ़ते रहने की रूचि प्रदान करे. ताकि मैं जो भी गया अर्जन केरु वो बाकी सब लोगो मैं भी प्रदान कर सकू . यदि मानव का सम्पूर्ण जीवन केवल भोगो उपयोग और सामाजिक जीवन के कुछ ही स्टार पर ऊँचा चढ़ने मैं बिता हो , तो सारा मानव जीवन बेकार ही समझा जायेगा.यदि आपको महानता की उच्च सीढ़ी चढ़ना हो तो आपको, ज्ञान का ही सहारा लेना होगा. क्योकि इसके बिना एक महँ जीवन जीना एक दम से बेकार होता है.

एक प्रसिद्द विद्वान ने कहाँ है की “ज्ञान से ही मानव मैं एक उच्च स्थान प्राप्त करने की पात्रता होती है, सुख और वैभव कभी भी ज्ञान के बिना नहीं मिलते है, तो फिर सम्पूर्ण आनद तो मिलना इसके बिना मुश्किल ही होता है. यदि आपको किसी के पास कोई भी वास्तु भेजनी है तो वो केवल ज्ञान के जरिये ही भेजी जा सकती है.”


यदि आप संसार को देखते है तो आपको sari वास्तु विलक्षणता से परिपूर्ण ही दिखती है. पुरे संसार मैं ऐसा कौन है जो की आस्चेरियो के परती आकर्षित ना हो. हमे सदा ही अपनी धार्मिक वर्ती को तेजस बनाकर आध्यात्मिक तत्वों की खोज करनी चाहिए.क्योकि ज्ञान ही धार्मिकता के साथ मिलकर विध्या कहलाता है. अपने अक्सर देखा ही होगा की अनेको महापुरषो ने बड़े बड़े महान काम किये है. क्योकि उन्होंने सदा ही समय का दुरूपयोग किया है. वे दिनभर मैं कम से कम १८ घंटे काम किया करते थे. बढ़ते हुए ज्ञान की पूंजी से सांसारिक सुख भी भुनाए जा सकते है और साथ ही पारलौकिक अनुभूतियों का सुख भी प्राप्त किया जा सकता है. पुराने लोगो मैं ज्ञान साधना की स्वाभाविक वर्ती हुआ करती थी .

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ऐसा माना जाता है की ज्ञान की देवी माँ सरस्वती जी को कहा जाता है.ये सत्य भी है. इसलिए लोग उनकी आजीवन उपासना किया करते थे. लेकिन अब तो स्थिति बिलकुल भिन्न हो चली है. अब तो पेपर होने के बाद स्टूडेंट अपनी किताबो को कहनी दूर एक स्थान पर रख दिया करते है ताकि अब वो उन्हें अपनी छुटियो मैं ना देखनी पड़े

आपको तो मालूम ही होगा की विध्या मनुष्य को सौम्य और उदार बनाती है. यदि जहा पर विध्या की पर्तिस्था होगी भला वह पर क्यों किसी प्रकार की कलह और समस्याए उत्पन्न होगी. इसलिए हमे समस्याओ का समाधान करने के लिए सबसे पहले , अपने विद्याबल को बढ़ाना होगा. क्योकि लोगो का ऐसा मानना है की जहा पर लोगो का विध्या की और झुकाव नहीं होगा वहाँ पर सदा ही विध्या का अभाव ही होगा और लोगो मैं ऐसी घटनाये बढ़ती जी जाएगी. एपिक टेटस नमक एक गुलाम का उसके मालिक ने पैर तोड़ दिया था और वो कई वर्षो तक अपनी झोपडी मैं रहा और उसने वही पर सस्त्रो का ज्ञान लिया , तब जाकर वो कही एक विधमान बना , आज भी रोम के लोग उसका लोहा मानते है.


तो दोस्तों हम आज के बदलते हुए इस दौर मैं इस आध्यात्मिक जरूरत को बिलकुल ही भूल गए है, विध्या आत्म कल्याण का साधन होती है. लेकिन अब उसे इस मॉर्डन समाज ने बिलकुल ही ख़तम कर दिया है. अब ये सब की सब उपलब्धिया हमे तभी प्राप्त हो सकती है जब हम ज्ञान को सही पर्तिस्था दे और उसके लिए सब कुछ निछावर कर दे. तभी हमे सही ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है.

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