ब्लड मेरी ने लिया अपना बदला

ब्लड मेरी ने लिया अपना बदला Blood mery ne liya apna badla real ghost stories in hindi

 

दोस्तों ये ब्लड मेरी की कहानी मेरे ही गांव के एक आदमी ने मुझे सुनाई थी, जो मुंबई में काम करते थे, उनसे सुनी थी. एक बार की बात है कि कुछ शिकारी भारत के किसी जंगल में शिकार पर गए. उस जंगल के बाहर एक डाक बंगला था पर उसमें पहले से ही कोई बड़ा अधिकारी ठहरा हुआ था, अस्तु इन शिकारियों को जंगल के बीच बने एक पुराने डाक बंगले में रूकना पड़ा. इस डाकबंगले का रखवाला अपने परिवार के साथ रहता था और डाकबंगले में रुकने वाले लोगों की सेवा करता था. इस रखवाले के परिवार में उसकी बीबी तथा लगभग 13-14 साल की उसकी एकमात्र लड़की थी. एक शाम जब शिकारी शिकार करके वापस डाक बंगले पर आए तो नहा धोकर पीने बैठ गए. पीने के बाद उन्हें इतनी चढ़ गई कि वे लोग पूरी तरह से बहक गए और उस रखवाले को गोली मारने के बाद उसकी बीबी तथा बच्ची को नोच डाले. इन पापियों को नशे में कुछ भी पता नहीं चला और नोचने के बाद उन दोनों को भी गोलियों से भून डाले और तीनों की लाश को डाक बंगले के पीछे दफना दिए. यह बात आई गई रह गई. अंग्रेजों ने फिर कुछ दिन के बाद वहाँ वेद प्रकाश नामक एक नया सेवक रख दिया. किसी को कुछ भी पता नहीं चला कि इस पुराने डाकबंगले का पुराना सेवक और उसका परिवार कहां चला गया. एक बार कि बात है कि नया सेवक वेद प्रकाश रात को गेट बंद करके सोया हुआ था. तभी अचानक उसकी नींद खुल गई क्योंकि उसे लगा कि दरवाजे पर कोई रो रहा है. उसने एक हाथ में लाठी उठाया और दूसरे में चिराग और दरवाजे पर आकर हाँक लगाया, “कौन है. इतनी रात गए कौन दरवाजे पर रो रहा है.” उसने देखा कि एक किशोरी दरवाजे पर बैठी रो रही है. वेद प्रकाश उस किशोरी के पास गया और उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा कि बेटी रो मत, अंदर चल. फिर उस किशोरी के अंदर आने पर वेद प्रकाश ने उसे पीने के लिए पानी आगे बढ़ाते हुए पूछा कि बेटी तुम कौन हो और इतनी रात को अकेले इस जंगल में क्यों भटक रही हो.

वेद प्रकाश की इतनी बातें सुनते ही वह किशोरी और तेज फफक पड़ी. कुछ समय तक तेज तेज रोने के बाद वह थोड़ा शांत हुई और वेद प्रकाश को बताई कि वह इस डाकबंगले के पहले सेवक की पुत्री है. फिर उसने यह भी बताया कि कैसे 5-6 शिकारियों ने उसके पिता को मार डाला और उसके बाद उसके तथा उसकी माँ की आबरू को नोच डाला. फिर कैसे उसकी माँ तथा उसको भी गोलियों से भूनने के बाद डाक बंगले के पीछे दफना दिया. उस किशोरी की इतनी बातें सुनते ही वेद प्रकाश पूरी तरह सहम गया पर निडरता दिखाते हुए पूछा कि ऐसे कैसे हो सकता है. अगर तूँ मर गई है तो मेरे सामने कैसे बैठी है. वेद प्रकाश की यह बात सुनते ही वह लड़की अचानक गायब हो गई और वेद प्रकाश कुछ समझ पाए इससे पहले ही वह उस कमरे की दिवाल पर उलटी टहलती नजर आई. वेद प्रकाश यह नजारा देखकर पूरी तरह से सहम गया. फिर अचानक वह लड़की आकर वेद प्रकाश के सामने बैठते हुए बोली कि काका, आप डरिए मत. मैं आपका कुछ भी बुरा नहीं करूँगी. धीरे धीरे वेद प्रकाश का डर जाता रहा और उसने अपने मस्तक पर आईं पसीने की बूँदों को गमछे से पोछ लिया. फिर उसी रात को उस लड़की ने वह जगह दिखाई जहाँ उन तीनों को दफनाया गया था. वेद प्रकाश ने कुदाल से खोदकर उन तीनों के अस्थिपंजर को निकाला. फिर वेद प्रकाश ने उस किशोरी से वादा किया कि वह उन शिकारियों के खिलाफ कोर्ट जाएगा और किशोरी को इंसाफ दिलवाकर रहेगा. वेद प्रकाश की बातें सुनकर वह किशोरी रोते हुए बोली कि काका, आपको कुछ नहीं करना है, बदला तो मैं लूंगी बस आप मेरी थोड़ी सी मदद कर दें. फिर क्या, उस किशोरी के बताए अनुसार वेद प्रकाश ने बीमारी का बहाना बनाकर उस डाकबंगले की नौकरी छोड़ दी तथा उस किशोरी को किए वादे के अनुसार उस किशोरी के माता पिता की अस्थियों को जला दिया तथा उन दोनों के नाम पर पूजा पाठ भी करवाया. उन दोनों की मुक्ति हो गई पर लड़की के कहे अनुसार वेद प्रकाश ने न लड़की के अस्थिपंजर को जलाया और न ही उसके क्रिया कर्म के लिए कोई अनुष्ठान, पूजा पाठ ही किया. क्योंकि किशोरी ने कहा था कि अगर उसके लिए भी पूजा पाठ हो गई तो वह इस भूतही योनि से मुक्त हो जाएगी और फिर उन दरिंदों से बदला नहीं ले पाएगी. समय बीतता गया और अब उस डाकबंगले में कोई नया सेवक आने को भी तैयार नहीं होता क्योंकि वेद प्रकाश वहीं आस पास मँडराता रहता और नए आनेवाले सेवक को भूतही कहानी सुनाकर भगा देता, कभी कभी वह किशोरी भी अपनी भूतही कारनामे से आनेवाले नए सेवक को नौ दो ग्यारह कर देती. पर उस बंगले पर शिकारियों का आना कम नहीं हुआ, वे आते और खुद ही अपनी व्यवस्था करते.

पर जो अब आता वह वापस नहीं जाता, क्योंकि उस डाकबंगले में ठहरने वाला हर शिकारी उस लड़की का शिकार हो जाता. कभी कभी तो ऐसा होता कि वह लड़की किसी शिकारी को अपने लटकों झटकों में फँसाकर उस डाकबंगले में लाती और रात को अपने असली रूप में आ जाती और डराकर उस को मार डालती और उसका खून पी जाती. यह क्रम चलता रहा और उस डाकबंगले में मरने वाले शिकारियों की मौत रहस्य ही बनी रही. अधिकारियों के लाख कोशिश के बावजूद न हत्यारा पकड़ में आता और नहीं मरने वाले शिकारियों, अधिकारियों के मौत का कारण पता चलता. धीरे धीरे यह खबर आस पास के क्षेत्रों में, शिकारियों आदि में फैल गई कि पुराने डाक बंगले में ठहरने वाले हर शिकारी की रात तो होती है पर वह दूसरे दिन का सूरज नहीं देख पाता. दो तीन और वर्ष बीते और अब वह डाक बंगला खंडहर हो गया, क्योंकि अब किसी में भी हिम्मत नहीं थी कि वहाँ ठहरे, आखिर किसको अपनी जान की परवाह नहीं होती. पर वह किशोरी भूतनी जो अब युवती बन गई थी, उसी डाकबंगले में रहकर अपने हत्यारों का इंतजार करती. दिन में उधर आने जाने वाले लोगों को उसका एहसास होता, क्योंकि वह बराबर रोती रहती पर किसी को दिखाई नहीं देती. एक बार की बात है कि वह युवा भूतनी उस जंगल में रह रहे एक युवा भूत तथा युवा भूतनी के संपर्क में आई. ये दोनों आदिवासी थे और जंगल में लकड़ी काटते समय किसी शिकारी के शिकार बन गए थे. युवा भूतनी उन दोनों को लेकर शहर की ओर निकल गई. युवा भूतनी उन दोनों भूत भूतनी के साथ शहर में घूम घूमकर अपने हत्यारों की तलाश करती रही. 3-4 दिन की मेहनत के बाद ही वह अपने हत्यारों को पहचान ली. एक दिन वह शाम के समय खूब खूबसूरत युवती बनकर उनमें से एक हत्यारे शिकारी के घर पर गई. घर पर उस के सिवा कोई नहीं था. फिर उसने खूब लटके झटके दिखाए और उस को अपनी सुंदरता में फाँस लिया. रूप लुभावन हो तो अच्छे अच्छों को फँसते देर नहीं लगती. योजना के अनुसार वह दूसरे दिन भी उस से मिली, फिर उसे पूरी तरह विश्वास में लेने के बाद एक दिन कही कि क्यों नहीं हम लोग शिकार पर चलें. ने कहा कि अच्छी बात है, मेरे कुछ मित्र शिकारी हैं, उन्हें भी लेकर चलते हैं. फिर क्या था, उस युवती भूतनी ने उस से कहा कि मेरी एक और सहेली है, वह भी बहुत ही खूबसूरत है और शिकार पर जाना पसंद करेगी. फिर दूसरे दिन उस युवती भूतनी ने अपने साथ आए हुए दूसरी युवा भूतनी से उस शिकारी को मिलवाया. अब तो पूरी तरह उस भूतनी के माया जाल, रूप जाल में फँस चुका था.

एक दिन सुबह सुबह वह अपने उन्हीं पुराने दोस्तों के साथ जंगल की ओर निकल पड़ा. दिनभर शिकार करते रहे और खूब मौजमस्ती भी. शाम होने को आई तो शिकारियों ने कहा कि अब सूर्य ढलने लगा है, क्यों न हम लोग वापस शहर लौट चलें. की बात सुनकर उस युवा भूतनी ने कहा कि ना ना, आज रात हम लोग यहीं ठहर कर जंगल का आनंद उठाते हैं. पर एक शिकारी ने कहा कि हमने पहले से डाकबंगला तो बुक किया नहीं है, ठहरेंगे कहाँ. फिर क्या था, वह युवा भूतनी मुस्कुराई और बोली कि इसी जंगल में दूसरी ओर मेरे एक मित्र आदिवासी की कुटिया है. हम रात वहीं बिताएंगे और खूब मौजमस्ती करेंगे. अब हुआ यूं कि उस युवा भूतनी की योजना के अनुसार देखते ही देखते उसके मित्र युवा भूत ने एक मड़ई तैयार कर ली थी, उसमें ऐशो आराम की सारी चीजें भी ला दी थी. उन दोनों युवा भूतनी के साथ ये उस मड़ई में पहुँचे. इन शिकारियों को उस मड़ई की दशा देखकर अजीब लगा क्योंकि उस मड़ई में महलों, बड़े बड़े होटलों जैसी व्यवस्था थी. रात को पार्टी शुरू हुई तथा साथ ही अधिकारियों की सिट्टी पिट्टी गुम होना ही. क्योंकि पहले तो उन दो युवा भूतनी जो देखने में बहुत खूबसूरत लग रही थीं अचानक बहुत ही डरावनी रूप बना लीं. ऐसा रूप जिसे देखते ही अच्छे अच्छों की पैंट गीली हो जाए. फिर क्या था उन भूतनियों ने ग्लास में खून भरकर लाकर उन अंग्रेजों को पिलाना शुरू कर दिया. किसी की हिम्मत ही न थी कि वह ना करे, क्योंकि सब के सब पूरी तरह से डरे हुए थे और काँप रहे थे. अचानक आदिवासी युवा भी विकराल रूप में आ गया और अचानक उछल कर पास के एक मोटे पेड़ की मोटी शाखा को उछलकर इतना जोर से खींचा कि चर्र की आवाज के साथ वह मोटी शाखा टूट गई. उसके बाद वह विकराल भूत उन शिकारियों में से एक को पकड़कर पैर के नीचे दबाकर देखते ही देखते चीर दिया और उसके खून को पीने लगा. उसका खून पीता देख दोनों भूतनियों ने भी लंबी लंबी विकराल चीभ निकालते हुए खून पीने में उसका साथ देने लगीं और साथ ही अपने बड़े बड़े नाखूनों से उसका शरीर जगह जगह से चीरने लगी. उस युवा भूतनी ने तो भयानक आवाज निकालते हुए दौड़कर एक दूसरे शिकारी के पास पहुँची और उसकी आँखों में अपने विकराल, भयावह, भाले जैसे नखों को डालकर उसकी दोनों आँखों को निकालकर खा गई. इसके बाद उन तीनों भूतनी भूत ने एक एककर सभी शिकारियों को मार डाला.

दूसरे दिन उन अंग्रेजों की खोज में गए अधिकारियों को उनकी ऐसी वीभत्स लाशें मिलीं जो देखने में बहुत ही भयावह लग रही थीं. उनको ऐसे नोचा गया था कि लगता था कि यह किसी मनुष्य या जानवर का काम ही नहीं हो सकता. वेद प्रकाश को तो सबकुछ पता ही था पर वह किसी को कुछ नहीं बताया. फिर एक दिन समय निकालकर, गोपनीय रूप से वेद प्रकाश ने उस युवा भूतनी के कंकाल को भी जला दिया तथा उसकी मुक्ति के लिए एक पूजा करवा दी. यह एक काल्पनिक कहानी है, पर हकीकत भी हो सकती है, उन लोगों के लिए जो अपनी शक्ति, संबंधों का नाजायज फायदा उठाते हुए गलत कार्यों को अंजाम देते हैं और उन्हें लगता है कि कोई उनका बाल बाँका भी नहीं कर सकता. हमेशा वैसा ही कार्य करें, जैसा आप दूसरों से अपने तथा अपनों के प्रति चाहते हैं. दोस्तों आपको ये कहानी किसी लगी , हमे जरूर बताये.

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