भूत बनकर सताया एक सच्ची कहानी

भूत बनकर सताया एक सच्ची कहानी Bhoot bankar sataya ek sacchi kahani real ghost stories in hindi

 

मेरा नाम यादव है. मेरा जन्म आज से लगभग 85 साल पहले एक ऐसे गाँव में हुआ था . मुझे याद है मैं उस समय 14 साल की रही होगी तभी मेरे हाथ पीले कर दिए गए थे. सादी के बाद मैं नए गाँव, घर-परिवार में आ गई. इस नए घर का माहौल ठीक-ठाक ही था. 3 सालों के बाद मैं एक बच्ची की माँ बन गई. पर मैं कुछ समझ पाती इससे पहले ही वह लड़की पता नहीं कहाँ गायब हो गई और मुझे यह बताया गया कि वह मरी हुई ही पैदा हुई थी, पर मुझे उसका रोता चेहरा आज भी याद है. मैं उस समय कुछ प्रतिकार नहीं कर पाई, क्योंकि घर-गाँव का माहौल ही कुछ ऐसा था कि मेरी सुनने वाला कोई नहीं था. मैं अपने मायके वालों से इस बारे में बात की पर वे लोग भी मेरा साथ नहीं दे पाए. खैर इस घटना को बीते लगभग 1 साल ही बीते थे कि फिर मैं एक बच्ची की माँ बनी. पर हाय रे प्रभु इस बच्ची का मुँह भी ठीक से मैं नहीं देख पाई. पता नहीं प्रभु को क्या मंजूर था. 1-1 वर्ष या 14-15 महीनों पर मैं लगातार बच्चे जनने वाली मशीन बनी रही, पर शायद ये बच्चे समाज, घर के किसी काम के नहीं थे.

एक-एक करके मेरी पुत्रियाँ इस हृदयहीन समाज में साँस लेने के पहले ही काल के गाल में समाती गईं. मुझे याद है लगभग 6-7 सालों में मुझे 5 पुत्रियाँ प्राप्त हुई थीं, पर कोई भी अंगने में किलकारी नहीं ले पाई थी. इनके मौत का राज मेरे लिए अबूझ पहेली था, और इस पहेली को सुलझाने वाला भी कोई नहीं था. अब तो जिस घर में मैं लक्ष्मी बनकर आयी थी, उसी में अब दरिद्रा हो गई थी. एक असहाय अबला. जिसे कोई भी दुरदुरा देता था. किससे कहूँ अपना दुख. खुद मेरे पति भी अब मुझे बात-बात पर मारने दौड़ पड़ते थे.

एक दिन की बात है, शाम का समय था और मेरे सास-ससुर दोगहे में बैठकर कुछ खुसुर-पुसुर कर रहे थे. पास ही में मेरे पति भी बैठे हुए थे. उस दिन मैंने हिम्मत करके इन लोगों से कुछ कहने के लिए किवाड़ की ओट में खड़ी हुई. पर यह क्या अभी मैं कुछ कहने की हिम्मत करूँ इससे पहले ही मेरी सास ने मेरे पति से कहा कि ये कलमुँही केवल कलमुँही ही पैदा करेगी. यह जबतक है तेरी दूसरी शादी भी नहीं कर सकती. पर कुछ भी कर एक कुलदीपक दे ही दे मुझे. बिना कुलदीपक का मुँह देखे मैं कत्तई मरना नहीं चाहती. फिर अचानक मेरे पति ने कहा कि माँ धीरज रख. आज ही कुछ इंतजाम कर देता हूँ. मैं तो एकदम से डर गई थी क्योंकि उस समय ये मेरे अपने इंसान कम दरींदा अधिक लग रहे थे.

जिसका डर था वही हुआ. उसी रात मुझपर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग के हवाले कर दिया गया. मैं चाहकर भी कुछ न कर सकी, बस केवल चिखती रही, चिल्लाती रही पर सुने कौन? अंततः मेरी इह लीला समाप्त हो गई. न पुलिस आई न गाँव के कुछ लोग. गाँव के कुछ लोग भी यही कहते रहे कि मैं कुलटा थी, मेरे उस घर में आते ही उस घर की खुशियाँ छिन गई थीं. पर क्या ऐसा था, मुझे पता नहीं. मेरे माता-पिता, भाई-बहन भी बस आँसू ही बहा पाए, कुछ कर नहीं पाए. मेरी आत्मा भटकती रही. कुछ महीनों बाद मेरे पति की दूसरी शादी भी हो गई. पर अब तो मैं पूरी तरह से इन कथित अपनों को सबक सिखाने का मन बना चुकी थी.

भगवती बाबा और शांता आज बहुत परेशान नजर आ रहे थे. उनकी बहू दुलारो पेट से थी और रह-रहकर कराह उठती थी. पता नहीं क्यों जब भी उसे गर्भ रहता तो उसे पेट में अत्यधिक दर्द शुरु हो जाता. इसके पहले भी उसके 2 भ्रूण नुकसान हो चुके थे. भगवती बाबा का एक ही पुत्र था बहोरन. दुलारो उसकी तीसरी पत्नी थी. दरअसल सुनने में यह आता है कि बहोरन की पहली पत्नी से लगभग 1-1 साल के अंतराल पर 5 पुत्रियाँ पैदा हुई थीं पर सभी मरी हुई और जिसके चलते अंततः बहोरन की पहली पत्नी अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा ली थी और सदा-सदा के लिए इस दुनिया का परित्याग कर दी थी. बहोरन की दूसरी बीबी से केवल दो लड़कियाँ ही थी पर पुत्र की लालसा में बहोरन के माता-पिता ने बहोरन की तीसरी शादी भी कर दी थी. गाँव की दाई की माने तो बहोरन की दूसरी बीबी भी जब एक बार पेट से थी और खरबिरउरा दवा आदि तथा उसके हाव-भाव से ऐसा लगता था कि पेट में लड़का ही है, तो उसे भी सहनीय पीड़ा होती रहती थी और अंततः उसका वह गर्भ भी नुकसान हो गया था. तो गाँव वालों को यह लगता था कि बहोरन की पत्नी को जब भी लड़का होने को होता है तो बहुत ही दर्द होता है और जब लड़की होने को हो तो आराम से हो जाता है. अब गाँव वाले इस बात को बहोरन की पहली पत्नी से जोड़कर देखते थे.

गाँव में धीरे-धीरे यह भी बात फैलना शुरु हो गई थी कि बहोरन की पहली पत्नी से जो भी पाँच लड़कियाँ पैदा हुई थीं, सबके सब ठीक थीं पर बहोरन काका और उनके घर वालों की मिलीभगत से उन मासूमों को सदा के लिए मिट्टी के नीचे दफना दिया गया था. क्योंकि वे लोग लड़का और सिर्फ लड़का चाहते थे. उन्हें कुलदीपक चाहिए था और उस कुलदीपक के चक्कर में इन लोगों ने शक्ति स्वरूपा कन्याओं को कंस बनकर हत्या कर दी थी. इतना घोर अनर्थ और फिर भी कोई प्रतिकार नहीं? अब तो गाँव वाले सदमे में रहते थे क्योंकि पेट से होने पर गाँव की कई बहुओं के साथ उल्टी-पुल्टी घटनाएँ घटना शुरु हो गई थीं.

खैर अब आपको भगवती बाबा के घर में ले चलता हूँ. भगवती बाबा की बहू दुलारो अंगने में पड़ी कराह रही है, पास में गाँव की दाई और गाँव की 2-4 बुजुर्ग महिलाएँ बैठी हुई हैं. सब की सब उदास हैं. शांता रह-रहकर रोती हैं और भुनभुनाती हैं कि उनकी पहली बहू ही यह सब कर रही है. वे अचानक घर से बाहर निकलकर भगवती बाबा से कहती हैं कि बहू को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती करा दीजिए. भगवती बाबा सहमति में सर हिलाते हैं तभी दाई हड़बड़ाए हुए घर से बाहर निकलती है और शांता की ओर इशारे से कुछ कहती है. अच्छा तो शांता का यह कुलदीपक भी अब इस दुनिया में आने से रह गया.

एक दिन की बात है. शांता रात को खाट पर सोए-सोए ही चिल्लाने लगीं, छोड़-छोड़ मेरा गला. छोड़-छोड़. उनकी आवाज सुनकर भगवती बाबा, बहोरन आदि उनके पास आ गए. उन लोगों ने देखा कि शांता खुद ही अपने हाथों से कसकर अपना गला पकड़ी हैं और चिल्लाए जा रही हैं. उनकी आँखें थोड़ी सी लाल हो गई थीं और चेहरे पर हल्की सी सूजन भी आ गई थी. बहोरन ने आगे बढ़कर शांता के गले से उनका हाथ मजबूती से खींचकर अलग किया. फिर शांता को उठाकर एक-दो घूँट पानी पिलाया गया. अब तो पूरे घर वालों के आँखों से नींद कोसों दूर चली गई थी. सभी सहमे हुए ही लग रहे थे क्योंकि शांता रूआँसू होकर कह रही थी कि बहोरनी की पहली बहू ही थी जो उनका गला दबा रही थी.

दरअसल शांता ने कहा कि आज शाम को जब वे गोहरौरी में से गोहरा निकाल रही थीं, तभी वहाँ उन्हें कोई दिखा था पर अचानक गायब हो गया था. दो मिनट में ही ऐसा लगा कि गोहरौरी में भूचाल आ गया हो और पूरी मड़ई हिलने लगी थी. मैं एकदम से डर कर सर पकड़कर बैठ गई थी. तभी एक औरताना कर्णभेदक हँसी मेरे कानों में पड़ी थी, जो बहुत ही डरावनी थी. बाद में वह हँसी आवाज में बदल गई थी और चिल्ला रही थी कि अगर मैं कलमुँही थी, मेरी बेटियाँ कलमुँही थीं तो तूँ यह कैसे भूल गई कि तूँ भी तो किसी की बेटी है, मैं भी बेटी, तूँ भी बेटी तो केवल मैं ही कलमुँही क्यों? तूं क्यों नहीं? तुझको कुलदीपक चाहिए ना, देती हूँ मैं तुझे कुलदीपक. इतना कहने के बाद वह आवाज फिर से हँसी में बदल गई थी और मैं बस अचेत मन, सहमे हुए वह आवाज सुनती रही थी. और अभी वही मेरा गला भी दबा रही थी.

प्रभु तो अगम है ही कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएँ भी घटित हो जाती हैं जो किसी अगम से कम नहीं होती. इंसान इनको चमत्कार मान लेता है या किसी गैर-इंसान का कार्य. क्योंकि इसके सिवा कोई चारा भी तो नहीं बचता. भगवती बाबा के साथ ही उनका पूरा परिवार तथा उनका पूरा गाँव एक रहस्यमयी संभावित खतरे में जी रहा था. उनको लगता था कि कहीं कुछ तो ऐसा है जो जाने-अनजाने उनका अहित कर रहा है, परेशान कर रहा है उन्हें तथा उनके पूरे गाँव को. उनके ग्राम-प्रधान तथा अन्य घरों के बड़े-बुजुर्ग इस खतरे से पार पाने के लिए हाथ-पैर मार रहे थे पर की समाधान नहीं निकल पा रहा था. गाँव में अखंड किर्तन से लेकर कितने सारे पूजा-पाठ किए गए पर समस्याएं जस की तस. कितने ओझा-सोखा आए पर की समाधान नहीं.

एक दिन गाँव की एक औरत सुबह-सुबह अपने खेतों में गेहूँ काटने गई थी. अचानक उसे पता नहीं क्या हुआ कि विकराल रूप बनाए अपने गाँव में दाखिल हुई और बस एक ही रट लगाए जा रही थी, अब इस गाँव के किसी भी घर में कोई कुलदीपक नहीं आएगा, जो हैं भी, वे भी एक-एक करके काल की गाल में समा जाएंगे, मेरा भोजन बन जाएँगे, मैं किसी को भी नहीं छोड़ूगी, ए ही सब कहते-चिल्लाते वह ग्राम-प्रधान के दरवाजे पर पहुँचकर तपड़ी, “निकल परधान, बाहर निकल, उस दिन तूँ कहाँ था, जब मुझे और मेरी बेटियों को जिंदा ही दफनाया जा रहा था, जलाया जा रहा था, उस दिन तो तूँ, चैन की नींद सो रहा था, रहनुमा बना है न तूँ इस गाँव का….मेरी बात अब कान खोल कर सुन ले, न अब तूँ बचेगा और ना ही इस गाँव का कोई और. सबको तहस-नहस कर दूँगी. चुन-चुन कर बदला लूंगीं, अभी तक तुम लोगों ने एक मरी आत्मा का कहर नहीं देखा है, जो अब शुरु होने वाली है.” इतना सब कहने के बाद व औरत बेहोश हो गी, उसे उठाकर उसके घर पर लाया गया. धीरे-धीरे आधे-एक घंटे में व सचेत हुई.

अब तो उस चुड़ैल ने, भूतनी ने उस गाँव पर अपना कहर बरपाना शुरु कर दिया था. प्रतिदिन कोई न कोई ऐसी घटना घटने लगी जिसने गाँव वालों से उनका चैन छिन लिया. उनके आँखों की नींद सदा के लिए गायब होने लगी. वे लोग आतंक में जीने लगे. अरे यहाँ तक कि उस गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को उनकी माँ के साथ किसी न किसी रिस्तेदारी में भेजा जाने लगा. ऐसा लगने लगा कि गाँव में पूरी तरह से आंतक का, भय का साम्राज्य पसर चुका है. सबके चेहरे पर खौफ साफ नजर आने लगा था. प्रतिदिन उस गाँव की महिलाएँ नहा-धोकर दल बनाकर छाक देने देवीताने जाने लगी थीं. कड़ाइयां भाखना शुरु हो गया था. देवताओं की आराधना दिन व दिन बढ़ती ही जा रही थी.

एक दिन भगवती बाबा खेतों में मृत पाए गए थे. ऐसा लगता था कि किसी ने उनको तड़पा-तड़पाकर मारा हो. आधे कट्ठे तक की फसल उनके घसीटने के कारण बरबाद हो गई थी. उनके गले पर किसी के अंगुलियों के निसान उभर आए थे, जो बहुत ही भयावह थे. शांता भी एक दिन गोहरौरी में गोहरा निकालने गईं और वहीं एक जहरीले साँप ने उनकी इहलीला समाप्त कर दी. बहोरन पागल हो गया था. गाँव वालों की माने तो उसे किसी भूत ने अपने चपेट में लेकर पागल बना दिया था. वह एक दम पागलों जैसा इधर-उधर घूमता रहता और लोगों को परेशान किया करता. कभी-कभी उसमें इतना बल आ जाता की लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर मारता और इतना मारता कि कुछ लोग अधमरे हो जाते. कभी-कभी तो दिन में भी लोगों के घरों के दरवाजे बंद रहते और कोई घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. बरबादी और सिर्फ बरबादी ही दिखाई देती थी उस गाँव में.

कुछ दिनों के बाद एक साधू का आगमन हुआ उस गाँव में. वे बहुत ही सीधे-साधे और धार्मिक स्वभाव के थे. गाँव वाले उनके आगे बहुत गिड़गिड़ाए और उनसे चिरौरी किए कि उन लोगों को इस आत्मा से बचा लिया जाए. साधू बाबा पहले तो स्थिति को अच्छी तरह से समझे और पूरे गाँव वालों को बहुत ही फटकार लगाई. अंत में उन्होंने कुछ अनुष्ठान किया और उस मृत आत्मा को एक औरत पर बुलाया. मृत आत्मा के आते ही वह औरत आपे से बाहर हो गई और उत्पात मचाना शुरु कर दिया फिर साधूबाबा के अनुरोध पर वह धीरे-धीरे शांत हुई और रो-रोकर कहने लगी कि बाबा, इन गाँववालों ने केवल मेरी ही पुत्रियों को नहीं और भी कितनी ही बेटियों को जिदें जी गाँव के बाहर के बगीचे के किनारे दफन कर दिया है. मैं किसी भी किमत पर इन लोगों को छोड़ने वाली नहीं. इस गाँव में कोई नहीं बचेगा. अंत में साधूबाबा ने बहुत विनय करके उस महिला को शांत कराया. फिर गाँव वालों ने स्वपन्न में भी ऐसी घिनौनी हरकत न करने की कसम खाई और साधू बाबा द्वारा एक छोटा अनुष्ठान किया गया. सभी मृतक बालाओं की शांति के मंत्रोच्चार किए गए.

अभी तो वह गाँव पूरी तरह से शांत है पर अभी भी गाँव में और गाँव के बाहर एक अजीब सन्नाता पसरा रहता है. गाँव के बाहर निकलने पर आज भी ऐसा लगता है कि कोई महिला अपनी छोटी-छोटी बेटियों के साथ रो रही है. और कहीं न कहीं गाँव वालों को अपनी करतूत का भान करा रही है. आज भी मायूस है वह गाँव और वहाँ के लोग. “बेटी है तो कल है, बेटी है तो जीवन है.“

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