सुनसान हवेली की कहानी

सुनसान हवेली की कहानी Sunsan Heveli ki kahani ghost stories in hindi

 

हमारे गांव के पास मैं ही एक बहुत ही पुरानी हवेली है जी की लगभग 100 साल से सुनसान ही पड़ी हुई है. लोगो का कहना है की इस हवेली मैं देश के आज़ाद होने से पहले अंग्रेज रहते थे. एक दिन जब युद्ध हुआ तो उस हवेली पर आक्रमण हुआ और सभी लोग मारे गए. तभी से वो हवेली आज भी सुनसान है. इसलिए वहाँ से आज भी कुछ अजीब गरीब आवाजे आती है. जिसे सुनकर गांव और आस पास के लोग बहुत ही खौफ मैं जीते है.

ये बात सन 2010 की है जब मैं अपने गांव गया हुआ था, मैं अपने गांव लगभग 10 से 15 साल बाद ही गया था. हमारे गांव के घर मैं कोई भी नहीं रहता है. लेकिन काफी समय बाद जब बच्चो ने गांव जाने की जिद कर दी तो फिर मैं भी जाये बगैर नहीं रह सका. हमने गांव मैं कम से कम एक हफ्ते रुकने का प्लान बनाया. तो हम सब जैसे ही बच्चो के स्कूल बंद हुए तो अब चल दिय गांव की और. लेकिन वह पर जाना मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. मैं आज भी जब भी उस दिन को याद करता हु तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है.


मेरे पास अपनी खुद की आठ आठ सीटर कार है. तो हम सब चल दिए गांव की और, हमने कुछ खाना और कुछ साफ़ सफाई का सामान भी रख लिया. ताकि वह पर रहने मैं कोई समस्या न हो. हम घर से लगभग सुभे मैं 9 बजे निकले और शाम तक 5 बजे अपने गांव ग्वालियर जा पहुंचे. गांव मैं जाकर देखा की अब तो मात्र एक्का दुक्का लोग ही रहते है बाकि सब के सब गांव को छोड़ कर जा चुके थे शहर मैं.

हमने कार से सारा का सारा सामान उतर कर घर मैं रख लिया. पूरा परिवार बहुत ही खुश था गांव मैं आकर. सभी साफ़ सफाई मैं लग गए और मैं गांव मैं निकल पड़ा , संके हाल चाल पूछने के लिए. मुझे गांव के मुखिया मिले और मैंने उनसे पूछा की “चाचा यह गांव मैं इतनी शांति क्यों है, सब के सब कहा पर चले गए है.” मुखिया ने कहा की ” अब इस गांव मैं कोई भी नहीं रहना चाहता है क्योकि यहाँ पर तो बस अब भूत या प्रेत ही वास करते है.”

मुखिया की बात सुनकर तो मैं बहुत डर गया और बोलै की चाचा क्या ये बात सच है या फिर कोई ऐसे ही जूथ बोलता है की भूत होते है. मुखिया ने बताया की गांव के पास जो हवेली है वह पर रात भर तांडव मचता है और जो कोई भी उस हवेली मैं चला जाता है , चाहे दिन हो या फिर रात , वो कभी भी वापिस ज़िंदा लौट कर नहीं आता है. उस हवेली मैं आज भी उन मरे हुए अंग्रेजो की आत्मा भटक रही है. जो की पुरे गांव को ख़तम करती जा रही है.


मुखिया की बात सुन मैं वापिस अपने घर पर आ गया और साडी बात अपनी पत्नी नेहा को बताई, लेकिन वो सब मेरी बात को मानने से इंकार कर रहे थे. वो भूत या प्रेत को नहीं मानते है. उन्होंने कहा की हम तो अब कुछ दिन यही पर रहेंगे. मेरे मन मैं प्रतिद्वंद्ध चल रहा था, की जो बात मुखिया जी ने बताई है , अगर उसमे थोड़ी भी सच्चाई है तो मेरे परिवार का क्या होगा. लेकिन मैंने अपने परिवार की बात को मानकर वहाँ पर रहने का मन बना ही लिया.

हम सब रात का डिनर करके सोने के लिए चले गए थे, रात के लगभग 12.30 बजे होंगे की मुझे घर के बाहर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी. मुझे लगा की शायद कोई गांव का आदमी होगा. तो मैंने एक दम से आवाज लगाई “कौन है.” पर कोई भी बोलै नहीं , मैंने फिर से आवाज लगाई दोबारा से कोई नहीं बोलै. लेकिन कोई था जो घर के बाहर घूम रहा था. मैंने तुरंत ही दरवाजा खोला और देखा की बाहर तो कोई भी नहीं है, लेकिन आवाज तो अभी भी आ रही थी. तो फिर ये आवाज आखिर आ कहा से रही थी.

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मैं देखने के लिए जैसे ही गली के मोड़ पर गया तो देखता क्या हु की एक आदमी दूसरी और जा रहा था. मैंने उसे आवाज लगाई लेकिन वो पीछे नहीं मुड़ा और ना ही रुका. मैंने भाग कर उसे रोकना चाहा, पर जैसे जैसे मैं उसके पास जाता वो मुझे से उतनी ही दूर हो जाता था. मेरी तो कुछ भी समझ मैं नहीं आ रहा था. मैं उसके पीछे पीछे चलता गया और देखता क्या हु की थोड़ी ही देर मैं मैं उस हवेली के अंदर था और वो आदमी जो मेरे आगे था अब गायब हो चूका था यानी की कही पर भी नहीं दिख रहा था.

मैं अब घबरा गया की मैं कैसे यहाँ पर आ गया हु. मैंने वापिस जाने की सोची ही थी की मुझे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी. आवाज एक कमरे इ आ रही थी. मैं उस कमरे की और गया और दरवाजा खोल कर देखा की कौन है तो मुझे कमरे मैं पंखे पर लटकी हुई एक लाश दिख रही थी वो भी बिना शिर वाली. मैं तुरंत ही वहाँ से भागने की कोशिश करने लग गया, लेकिन सारे दरवाजे अब बंद हो चुके थे. अब आवाजे और तेज़ हो चली थी मैं डर के मरे मारा जा रहा था , लकिन तभी मुझे हवेली मैं सीढिया दिखायी दि, जो की हवेली मैं ऊपर की और जा रही थी.


मैं उन पर चल दिया और उन सीढ़ियों ने मुझे हवेली की छत पर पंहुचा दिया. अब तो मेरे पास बचने का बस एक ही रत्सा था , और वो था हवेली की छत से कूदना . मैंने अपनी जान बेचने के लिए हवेली की छत से छलांग लगा दी. और हवेली से निचे गिरते ही मेरे एक हाथ की हड्डी टूट गयी और मैं भाग कर अपने घर पंहुचा , और सारी बाते अपने परिवार को बताई. हम सब ने अब तुरंत के तुरंत गांव से जाने का मन बना लिया और हम सब जिस दिन वहाँ आये थे , उसी रात को वहाँ से वापिस चले गए. तब से मैंने आज तक अपने गांव दोबारा जाने की बात भी भूल, से अपने मन मैं भी नहीं सोची है.

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