कबीर के दोहे वेश एक

कबीर के दोहे वेश एक

kabir das ke dohe vesh1 kabir in hindi

दोस्तों आप लोग कबीर (kabir) के बारे मैं तो जानते ही होंगे. जी हां मैं उन्ही के बारे मैं बात कर रहा हु , जो की दोहे गाया करते थे. आज मैं आपके सामने उनके कुछ दोहे लेकर आया हु. ये दोहे वेश से सम्बंधित है, जो की अर्थ सहित है. ताकि आपको समझने मैं किसी भी प्रकार की कोई भी परेशानी ना हो.

1. अजार धन अतीत का, गिरही करै आहार
निशचय होयी दरीदरी, कहै कबीर विचार.

इसका अर्थ इस प्रकार है

सन्यासी को दान में प्राप्त धन यदि कोई गृहस्थ खाता है तो वह निश्चय ही दरिद्र हो जायेगा. ऐसा कबीर का सुबिचारित मत है.

2. उजल देखि ना धिजिये, बग ज्यों मंदै ध्यान
डारै बैठै चापते सी,यों लै बूरै ज्ञान.

इसका अर्थ इस प्रकार है

उज्जवल वेश देखकर विश्वास मत करो. बगुला नदी की धार के किनारे बैठ कर ध्यान लगाये रहता है और मछली पकड़ कर खा जाता है. उसी तरह वह धोखे बाज भी साधु के वेश में तुम्हारे विवके का हरण कर सकता है.

3. एैसी ठाठन ठाठिये, बहुरि ना येह तन होये
ज्ञान गुदरी ओढ़िये, काढ़ि ना सखि कोये.

इसका अर्थ इस प्रकार है

एैसा वेश रहन सहन रखें की पुनःयह शरीर ना हो. पुनर्जन्म न हो. तुम ज्ञान की गुदरी ओढ़ो जो तुम से कोई ले न सके छीन न सके.

4. कबीर वेश अतीत का, अधिक करै अपराध
बाहिर दीशै साधु गति, अंतर बड़ा असाध.

इसका अर्थ इस प्रकार है

कबीर कहते है की उसका वेश भूसा सन्यासी जैसा है किन्तु वह बड़ा अपराधी है. बाहर से वह साधु जैसा करता है परन्तु अंदर से वह अत्यंत दुष्ट है. ऐसे वेश धारी साधुओं से सावधान रहना चाहिये.

5. कवि तो कोटिन कोटि है, सिर के मुंडै कोट
मन के मुंडै देख करि, ता सेग लीजय ओट.

इसका अर्थ इस प्रकार है

कवि उपदेशक असंख्य है. सिर मुड़वाने वाले भी कड़ोरों है. परन्तु जिसने अपने मन को मुड़वा लिया हो-माया मोह को मन से त्याग दिया हो-तुम उसकी शरण में जाओ.

6. कबीर वेश भगवंत का, माला तिलक बनाये
उनकों आबत देखि के, उठिकर मिलिये धाये.

इसका अर्थ इस प्रकार है

कबीर कहते है की किसी भगवान के भक्त को माला तिलक के वेश में आता देख कर उठ कर दौड़ कर उन से मिलें. उन की इज्जत प्रतिष्ठा करै.

7. कबीर वह तो एक है, पर्दा दिया वेश
भरम करम सब दूर कर, सब ही माहि अलेख.

इसका अर्थ इस प्रकार है

कबीर कहते है की ईश्वर परम तत्व के रुप में एक है. उसने अनेक वेश भूसा में पर्दा कर दिया है. सांसारिक कर्मो के भ्रम जाल को दूर कर देखो. वह परमात्मा सबों में बास करता है.

8. गिरही सेबै साधु को, साधु सुमिरै राम
यामे धोखा कछु नाहि, सारै दौउ का काम.

इसका अर्थ इस प्रकार है

एक पारिवारिक गृहस्थ को संतों की सेवा करनी चाहिये और संत को केवल राम का सुमिरन करना चाहिये. इस में कोई भ्रम या धोखा नहीं है. दोनो का यही काम है और इसी मे दोंनो का कल्याण है.

9. जेता मीठा बोलना तेता साधु ना जान
पहिले थाह देखि करि, औंदेय देसी आन.

इसका अर्थ इस प्रकार है

प्रत्येक मीठा बोलने वालों को साधु नहीं समझैं. प्रारम्भ में वे बहुत अपनापन दिखाते है और बाद में वे दूसरा रुप लेलेते है.

10. चतुराई हरि ना मिलय, येह बातों की बात
निसप्रेही निर्धार का, गाहक दीनानाथ.

इसका अर्थ इस प्रकार है

चतुराई से प्रभु की प्राप्ति संभव नहीं है. यह एक मूल बात है. एक निर्मोही एवं निराधार को प्रभु दीनानाथ अपना बना लेते है.

11. चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहाबै हंस
ते मुक्ता कैसे चुगे, परे काल की फांस.

इसका अर्थ इस प्रकार है

जिसका चाल चलन बगुले की तरह छल कपट वाला है लेकिन संसार की नजर में वह हंस जैसा अच्छा कहलाता है-वह मुक्ति का मोती नहीं चुग सकता है. वह मृत्यु के फांस में अवश्य गिरेगा.

12. जप माला छापा तिलक, सरै ना ऐको काम
मन कंचे नाचे बृथा, संचे रचे राम.

इसका अर्थ इस प्रकार है

जप माला तिलक लगाना आदि से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता है. अपरिपक्व मन से माला गिनने और नाचने से नहीं होगा. प्रभु तो केवल सच्चे प्रेमी को ही मिलते है.

13. जो मानुष गृहि धर्मयुत, राखै शील विचार
गुरुमुख बानी साधु संग, मन बच सेवा सार.

इसका अर्थ इस प्रकार है

जो गृहस्थ धर्म में रह कर अच्छा विचार व्यवहार रखता है, गुरु के शिक्षा का पालन, साधु की संगति, मन वचन से सेवा में रत रहता है-उसका गृस्थ जीवन सफल है.

कबीर के दोहे वेश 2

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