कहानी अनोखे चिंटू की

कहानी अनोखे चिंटू की Kahani anokhe chintu ki motivational kahani in hindi

 

ये कहानी है चिंटू की , जो की बहुत ही जिद्दी हैं और किसी की भी नहीं सुनता है. तो आज हम उसी के बारे मैं आपको आज बताने जा रहे है. एक बार उसने जिद्द ये पकड़ ली की , वो 1,000 रुपए लेके ही मानेगा. चिंटू ने तो जैसे जिद ही पकड़ ली थी. सुबह से ही वह 1,000 रुपए की मांग कर रहा था. सुजाता जी बहुत ही ज्यादा परेशान थी. 1,000 रुपए चिंटू पटाखों में फूंके, वह इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थी. खींचतान के मुश्किल से 6,500 रुपए ही तो घर में आ पाते हैं. उसका पति दिनेश कुमार और वे दिन भर जी तोड़ परिश्रम करते हैं, तब कहीं गुजारे के लायक कमा पाते हैं और यह चिंटू. सुजाता जी बड़बड़ा रही थी. इत‌नी सी कमाई में चिंटू की पढ़ाई, दूध पीती छोटी सी बुधिया का खर्च और फिर खाने पीने, राशन पानी का खर्च. कैसे जिंदगी की गाड़ी चल रही थी, यह वही जानती थी. सुबह से शाम तक पांच सात घरों में खटती रहती, झाड़ू पोंछा करती, बर्तन मांझती तब कहीं जाकर पहली तारीख को 3,000 रुपए ही ला पाती. दिनेश कुमार का क्या है, कभी 1,000 हजार तो कभी 2,500, इतना ही तो लाता है. सेठ के पास मजदूरी करता है. ईंट गारे का काम है, रोज तो होता नहीं, मिल गया तो ठीक नहीं तो जय सियाराम.

कहीं भी बैठकर दिनेश कुमार बीड़ी धोंकने लगता है. उसका खुद भी तो कोई ठिकाना नहीं होता. कभी कोई घर छूट जाता तो दूसरा देखना पड़ता. खैर, गाड़ी तो चल ही रही थी. आज वह दो घरों से कुछ रुपए दिवाली खर्च के लिए एडवांस ले आई थी. कुछ लोग होते हैं, जो दूसरों का दुख दर्द समझते हैं और यदा कदा सहायता कर देते हैं. श्रीमती मेहरा और श्रीमती सैनी ने महीने की पगार, महीना समाप्त होने के पांच दिन पहले ही दे दी थी. दिवाली 24 तारीख को पड़‌ गई थी. 900 रुपए में पूजा का सामान, प्रसाद, मिठाई, फल फूल लाएं या कि चिंटू को फूंकने को दे दें. चिंटू का असली नाम सुरेन्द्र पाल था, किंतु मुख सुख की चाहत ने उसे चिंटू बना दिया था. अभावों में रहते हुए भी सुजाता जी ने बच्चों की परवरिश में कोई भी कमी नहीं आने दी थी. चिंटू 6वीं में हिन्दी माध्यम के स्कूल में पढ़ रहा था. सरकार से किताबों और साइकल की व्यवस्था हो जाने से वह बेफिक्र थी. मिड डे मील में उसे शाला में ही खाना मिल जाता था. चूंकि चिंटू पढ़ने में भी होशियार था अत: उसे सौ रुपए महीने की छात्रवृत्ति भी मिल रही थी. आज दिवाली होने के कारण उसकी और दिनेश कुमार दोनों की छुट्टी थी.

वह तो खैर घर मालकिनों को बताकर आई थी कि वह दिवाली के दिन काम पर नहीं आएगी. मालकिनें नागा करने के कभी भी पैसे नहीं काटती थीं किंतु दिनेश कुमार. काम नहीं तो पैसा भी नहीं. बाजार जाने का प्रोग्राम बन गया था. दिवाली का सामान तो लाना ही था. दीये, तेल, बत्तियां, केले, मिठाई, लक्ष्मीजी की फोटो और नारियल, फल फूलों में ही 550-600 रुपए लग जाएंगे. पूजा का सामान तो आ ही जाएगा, परंतु इस चिंटू का क्या करें, जो सुबह से अड़ा है कि 1,000 ही लूंगा. .बेटा 1,000 तो बहुत होते हैं अपनी हैसियत नहीं है इतनी. फिर पटाखे चलाने का मतलब रुपए फूंकना ही है., सुजाता जी उसे समझा रही थी. .अम्मा 1,000 से बिलकुल कम न‌हीं लूंगा. इतनी महंगाई में 1,000 में आता क्या है. 9-10 अनार और 8-10 रस्सी बम ही 400 रुपए में आएंगे. फिर चकरी, फुल‌झड़ी दीवाल फोड़. 1,000 भी कम पड़ जाएंगे. मैं कुछ नहीं सुनूंगा. पप्पू एक हजार के लाया है. पर बेटा वे लोग पैसे वाले हैं, पप्पू का बाप तहसील ऑफिस में बाबू है. मुझे अभी 1,000 रुपए दे दो. मैं खुद ही बाजार चला जाऊंगा और पटाखे लूंगा अपनी मर्जी के, बिलकुल सौ टंच.. चिंटू के सिर पर‌ तो पटाखों का भूत सवार था. ठीक है. सुजाता जी ने उसके सामने एक 1,000 का नोट फेंक दिया था और गुस्से में फनफनाती हुई भीतर किचन में चली गई थी.

चिंटू ने वह नोट उठाया और बाजार चल दिया विजयी मुद्रा में. जैसे मां और बेटे के बीच लड़े गए पानीपत के युद्ध में बेटा जीत गया हो. उसे अब कौन समझाए कि ऐसी पानीपत की लड़ाइयों में माताओं को हारने में कितना आनंद आता है अन्यथा माताओं को कौन हरा सकता है. मां तो मां ही होती है. उसकी ममता बेटों की जिद के आगे अक्सर हथियार डाल देती है. धीरे धीरे शाम धरती पर उतर आई. मां का गुस्सा कपूर की तरह थोड़ी देर में ही उड़ गया. आखिर बच्चा ही तो है, मन की उमंगें हिलोर लेती रहती हैं. किसी मित्र को कुछ नया करते देखता है तो उसकी भी इच्छा वैसा ही करने की हो उठती है. मां प्रतीक्षा में थी कि चिंटू आते ही कहेगा  .देखो मां इतने सारे पटाखे! अनार, चकरी, फुलझड़ी, दीवाल फोड़, 1,000 रुपए में इतने सारे. परंतु रात होने को आई और वह आया ही नहीं, तब सुजाता जी को चिंता हुई कि कहां गया होगा. इतनी देर तो वह कहीं रुकता ही नहीं. दिनेश कुमार भी परेशान हो गया, जो अभी अभी बाजार से पूजा का सामान लेकर आया था. उसे बाजार में भी चिंटू कहीं नजर नहीं आया था. हे भगवान, क्या हुआ लड़के को, सोचते सोचते दिनेश कुमार उल्टे पांव लौट गया. चिंटू के दोस्तों के घर जा जाकर पूछने लगा.

उसके एक दोस्त ने बताया कि उसे कैलाश कक्का के साथ अस्पताल जाते देखा था. क्या अस्पताल क्या हुआ था चिंटू को, दिनेश कुमार बौखला सा गया. उसे कुछ नहीं हुआ. कैलाश कक्का के सिर से जरूर खून बह रहा था. दोस्त के मुंह से यह सुनकर दिनेश कुमार की जान में जान आई. दौड़ा दौड़ा वह अस्पताल जा पहुंचा. ढूंढता खोजता वह उस कमरे में पहुंच ही गया, जहां कैलाश कक्का पलंग पर पड़े थे और चिंटू बगल में एक स्टूल पर बैठा था. कैलाश के सिर पर पट्टी बंधी थी और वे कराह रहे थे. क्या हुआ चिंटू. इनको क्या हुआ. तुम यहां कैसे आए.. दिनेश कुमार जैसे उस पर टूट पड़ा. इतने सारे प्रश्न एक साथ सुनकर चिंटू से तत्काल कोई जबाब देते नहीं बना. थोड़ी देर वह चुप रहा फिर उसने बताया कि कक्का रास्ते में चक्कर खाकर गिर पड़े थे. सिर एक पत्थर में टकराने से खून बह रहा था और वह उन्हें अस्पताल ले आया था. कैलाश कक्का फफककर रोने लगे थे और चिंटू के सिर पर हाथ फेरने लगे थे. क्या हुआ कैलाश, सब ठीक तो है, अब अच्छे हो न. दिनेश कुमार ने सहानुभुति दर्शाते हुए पूछा.

बिलकुल ठीक हूं भैया, तुम्हारा बेटा तॊ साक्षात कृष्ण का अवतार है. यह न होता तो आज मैं सड़क पर ही मर जाता. मुझे यह यहां तक ले आया और भरती कराया. सब दवाइयां अपने पैसे से ले आया. कैलाश अभी भी कराह रहे थे. तू तो पटाखे लेने के लिए बाजार गया था, पटाखे नहीं लिए क्या, दिनेश कुमार ने पूछा. नहीं बापू नहीं लिए कक्का की दवाई में. तू तो जिद कर रहा था पटाखों की, अब क्या करेगा. नहीं बापू मुझे नहीं चाहिए पटाखे, कक्का ठीक हो गए, मुझे तो बहुत अच्छा लगा. पटाखे तो जलकर राख ही होने थे. दिनेश कुमार को लगा कि चिंटू अपनी उम्र से बहुत ज्यादा बड़ा हो गया है. उसने बेटे को गले से लगा लिया. कैलाश कक्का के आंसुओं की धार और तेज हो गई थी. इस तरह से चिंटू ने खुद के लिए पाठके ना खरीद कर , पहले काका की मदद की. हमे भी अपने जीवन मैं चिंटू की मदद करने वाली इस आदत को ढालना चाहिए.

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