कहानी एक लड़के और एक औरत की

कहानी एक लड़के और एक औरत की

Kahani ek ladke aur ek aurat ki motivational kahani in hindi

दोस्तों ये कहानी है एक लड़के और एक औरत की जो की आपको बहुत ही अधिक मोटीवेट करेगी. वो बार बार आपने केबिन से ऑफिस की एन्ट्रेंस की ओर देख रहा था तलाश रहा था किसी को या फिर शायद इन्तजार था उसे किसी का, सुरेश नाम था उसका, मैनेजर के पद पर कार्यरत था वो उस कम्पनी में और उसी कम्पनी में कार्यरत थी वो, आकांशा. सांवली किन्तु सुन्दर नैन नख्श वाली एक लड़की, रंग सांवला होने के बावजूद भी बला सी खूबसूरत थी वो ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी निपुण और परांगत मूर्तिकार ने खुद अपने हाथों से किसी सांवले संगमरमर को तराश कर सौन्दर्य से भी सुन्दर इस जीवित मूर्ति का निर्माण किया हो . वो सिर झुकाकर ऑफिस में आती , अपनी कानों में मिश्री घोलती आवाज में सबका अभिवादन कर अपने काम में लग जाती और शाम को छुट्टी के समय सबका अभिवादन करते हुए सिर झुकाए ही निकल जाती .

किसी ने कभी उसे किसी से फालतू बातचीत करते नहीं देखा और ना ही कभी उसके पास बहुत अधिक किसी का फोन आता ना जाने क्यों वो हमेशा अपने आप में ही खोई सी रहती . सुरेश पहले ही दिन से मन ही मन उसे चाहने लगा था लेकिन उसकी सादगी और शालीनता को देखते हुए कभी उससे कुछ कह ना सका उसके मन में ये भय था कि कहीं वो मना ना कर दे या कहीं वो सुरेश को गलत ना समझ ले. इन्हीं सब बातों में आज 7 माहीने गुजर गए थे सुरेश को दो दिन पहले ही पता चला था कि आज उसका जन्मदिन है और सुरेश ने फैसला कर लिया था कि कुछ भी हो लेकिन आज वो अपने हृदय में भरी अपनी भावनाओं को उसके सुकोमल हाथों में रख देगा उसके बाद वो चाहे तो उन्हें फेक दे और ना चाहे तो अपना ले बस .

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लेकिन आज वो काफी देर से आई इतनी ही देर में सुरेश ने ना जाने कितनी बार उठ उठकर देखा , याद किया उसे . सुरेश का मन आज काम में नहीं लग रहा था वो कभी घड़ी की ओर देखता कभी उसकी ओर देखता उसके बाद चेक करता अपने बैग में रखे उसे अधखिले गुलाब को जो वो लाया था अपनी उस संगीत से भी सुंदर आकांशा के लिए . वो गुलाब को बार बार छूता और मन ही मन यह सोचकर चुपचाप बैठ जाता कि शाम को बाहर निकलते ही उससे काफी के लिए पूछेगा और फिर वही पर ये फूल देकर उससे अपने दिल का हाल कहेगा . एक ओर आज सुरेश का हाल खराब था तो दूसरी ओर आकांशा भी आज कुछ परेशान सी लग रही थी वो बार बार अपनी पर्स से अपना फोन निकालकर देखती उसपर लगातार आ रही काल को डिस्कनेक्ट कर के फोन को वापस पर्स में रख लेती . उसका बार बार ऐसा करना सुरेश को अजीब सा लग रहा था वो बहुत देर से आकांशा को ऐसा करते देख रहा था.

वो बार बार फोन डिसकनेक्ट करती और उधर से दोबारा फोन आ जाता . अब 4 बजने को आए थे लेकिन अब भी वो फोन वाली प्रक्रिया जारी थी बीच बीच में आकांशा फोन पर शायद कुछ पढ़ने लगती फिर हड़बड़ी में कुछ टाइप करने लगती 5 बजे छुट्टी का टाइम हो चला है और उसे आकांशा की ये बदहवासी परेशान कर रही थी . उसने बेल बजाकर चपरासी को बुलाया और उसे आकांशा को भेजने का आदेश दिया . चपरासी ने जैसे ही आकांशा को बताया कि मैनेजर साहब ने उसे बुलाया है वो रोआसी सी हो आई उसे लगा कि ना जाने आज क्या हो गया क्या आज उसने कोई गलती कर दी. पहले तो उसे कभी इस तरह नही बुलाया गया. कहीं उसे बार बार फोन का इस्तेमाल करने के लिए फटकार तो नहीं लगाई जाएगी कभी उसकी काम को लेकर डाट नहीं पड़ी कहीं आज उसकी डाट तो नहीं पड़ जाएगी . वो सुरेश के केबिन में आते ही अपने आप रो पड़ी सर वो मेरे मोबाइल पर , बार बार.

वो इतना ही बोल पाई , सुरेश ने उसे चुप होकर बैठने का इशारा किया . क्यों रो रही हो तुम . मैने तो कुछ कहा ही नही. फोन के बारे मे क्या कह रही हो तुम . क्या कोई फोन कर रहा है बार बार तुम्हें. जी , वो महेश क् कोई नहीं कोई नहीं सर , कोई नहीं . डरो मत मुझे बताओ अगर कोई परेशान कर रहा है तो तुम मुझे अपना दोस्त समझ सकती हो कौन है ये महेश . अब आकांशा थोड़ी आश्वस्त हो चुकी थी कई बार पूछने पर उसने बताना शुरू किया. सर , कभी हम दोनो एक दूसरे को बहुत चाहते थे , मेरे पिताजी तभी चल बसे थे जब मैं बहुत छोटी थी मेरी माँ ने ही मुझे पाल पोसकर बड़ा किया पढ़ाया लिखाया , उन्हें सब बताया था मैने माँ की तबीयत अक्सर खराब रहती थी , वो जल्दी ही हम दोनों की शादी कर देना चाहती थीं महेश और उसके घर वाले भी राजी थे लेकिन फिर महेश ना जाने कहाँ घर छोड़कर भाग गया था.

बहुत तलाश किया लेकिन कुछ पता नहीं चला माँ चल बसी और मुझे मजबूरन महेश को भूलकर ये नौकरी करनी पड़ी आज पूरे 4 साल बाद वो लौट आया है और मुझे मिलने के लिए फोन कर रहा है क्यों मिलूं मैं क्या फायदा है मिलने का . वैसे तुम्हें मिलना चाहिए हर काम में फायदया नुकसान नहीं देखा जाता. लेकिन सर . कहाँ है वो . 2बजे उसने मैसेज किया था कि पार्किंग एरिया में इन्तजार कर रहा है वो . 6 बजने वाले थे और सर्दियों में 6 बजे अच्छा खासा अंधेरा हो जाता है वो अब भी वहीं खड़ा होगा . हाँ. शायद तो चलो तुम एक बार उस से बात तो करो सुनो तो आखिर वो कहना क्या चाहता है . लेकिन , चुप रहो और चलो मेरे साथ मैं वहीं छुपकर रहूँगा आसपास ही तुम घबराना नहीं . वो कुछ देर चुपचाप बैठी रही और फिर उठकर हाँ में सिर हिलाकर चल दी उसने अपने केबिन से अपना पर्स उठाया और सुरेश के साथ बाहर निकल आई . पार्किंग एरिया में पहुंचने से पहले ही सुरेश उस से अलग हो गया , आकांशा धीरे धीरे उस नवयुवक की ओर बढ़ रही थी.

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जो एकदम आखिर में बढ़िया कपड़े पहने हुए एक काली चमचमाती गाड़ी के पास खड़ा था . सुरेश आकांशा से कुछ दूरी बनाकर दूसरी ओर चल रहा था . महेश एक सुन्दर सजीला लम्बा चौड़ा युवक था मंहगा सूट उसके व्यक्तित्व में चार चांद लगा रहा था उसने बाहें फैलाकर आकांशा का स्वागत किया किन्तु वो उससे कुछ दूर ही रुक गई क्यों आए हो . ये कैसा सवाल है तुम्हें तो ये पूछना चाहिए कि कहाँ गए थे तुम्हारे लिए आया हूँ तुम्हें ले जाने . क्यों गए थे कहाँ गए थे जानते हो कितनी अकेली हो गई थी मैं माँ के जाने के बाद . वो फूटकर रो पड़ी बदले में महेश ने आगे बढ़कर उसे अपनी बाहों में समेट लिया , जानता हूँ मैने गलत किया लेकिन सब तुम्हारे लिए ही तो किया माफ कर दो मुझे मैं तुम्हारे लिए खुशियाँ कमाने गया था देखो कमा लाया . ये कहकर उसने अपनी गाड़ी की ओर इशारा किया . मैने तो ये सब कभी चाहा ही नहीं मैं तो बस तुम्हें चाहती थी तुम ही मेरी खुशी थे .

महेश को अब अपनी गलती का अहसास हो गया था, आ तो गया हूँ अब तुम भी लौट आओ . इसबार आकांशा भी आगे बढ़कर उसकी बाहों में समां गई दोनों एक दूजे को अपनी बाहों में लिए रो रहे थे और उनसे थोड़ी ही दूरी पर खड़ा सुरेश मन ही मन खुश हो रहा था इस मिलाप को देखकर काफी देर तक मंत्रमुग्ध सा खड़ा रहा वो और फिर बढ़ गया अपनी गाड़ी की ओर गाड़ी निकाल अपने घर के रास्ते पर आगे बढ़ते -2 उसने पड़ोस वाली सीट पर पड़ा बैग एक हाथ से खोलकर उसमें रखा वो गुलाब बाहर निकाल लिया और मुस्कराते हुए उसे देखकर खिड़की से बाहर फेका और FM चालू किया मुस्कराने की वजह तुम हो , गुनगुनाने की वजह तुम हो . उसके होठों पर एक लम्बी मुस्कुराहट खेलने लगी. दो आँसू उसकी आँखों की कोरों से निकले लेकिन सुरेश की मुस्कान इन आँसुओं से कहीं ज्यादा भारी थी और वो ‪आँसू हल्के थे‬.

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