कहानी वेदो के रहस्य की हिंदी कहानी

कहानी वेदो के रहस्य की हिंदी कहानी

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दोस्तों ये बात बहुत समय पहले की है. वाराणसी मैं वेदप्रकाश नामक एक पंडित रहा करते थे. उनके एक बेटा था जिसका नाम था विनोदनायक. एक दिन वेदप्रकाश ने विनोदनायक से कहा बेटा, किसी आश्रम में जाकर तुम ब्रह्मचर्य की साधना करो और वेदों का वहां पर गहरा अध्ययन करो. हमारे कुल की परंपरा यही रही है. कोई भी हमारे वंश में केवल ब्रह्मबंधु होकर नहीं रहा. ब्रह्मबंधु यानी स्वयं वेदों को न जानने वाला. विनोदनायक एक आचार्य के गुरुकुल में गया. 14 ½ वर्ष तक वह वहां रहा. वेद पारंगत होकर लौटा. अपनी वेद विद्या का उसे बड़ा गर्व हो गया. पिता वेदप्रकाश ने एक दिन उसे बुलाकर पूछा बेटा. तेरे गुरु ने क्या वह रहस्य भी बताया कि जिससे सारा अज्ञात ज्ञात हो जाता है. विनोदनायक वह नहीं जानता था.

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वह स्तब्ध रह गया. उसने नम्रतापूर्वक पिता से पूछा ऐसा वह रहस्य क्या है. मेरे आचार्य ने उसे नहीं बताया. तब, वेदप्रकाश ने उस रहस्य के विषय में विनोदनायक को प्रवचन किया, प्रारंभ में केवल सत् था, केवल एक, और अद्वितीय. सत् से ही सब कुछ बना है. वह कारण है और यह सब कुछ, सारा जगत्, समस्त ब्रह्मांड उसका कार्य है. बिना कारण के कार्य नहीं होता. सत् से ही सब कुछ बना है. उसमें से सब कुछ निकला है और उसी में सब लीन हो जाता है. कुछ नदियां पूर्व की ओर बहती हैं और कुछ पश्चिम की ओर. किंतु वे नदियां बनीं कैसे. समुद्र से जो भाप उठी थी, उसी से वर्षा हुई और वे नदियां बन गईं. वह पानी बह बहकर समुद्र में पहुंचा. समुद्र में पहुंचकर उन नदियों का पानी क्या यह जानता है कि मैं अमुक नदी का पानी हूं.

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सत् से जो उपजा वह नहीं जानता कि उसकी उत्पत्ति सत् से हुई है. यह बड़ा सूक्ष्म तत्व है. अणु के अंदर जो तत्व छिपा हुआ है, उस अव्यक्त को कौन जानता है. परंतु वह है. सत् को कौन नकार सकता है. मेरी बात को यदि ठीक तरह से न समझा हो, तो जा, वटवृक्ष का एक फल उठा ला. विनोदनायक फल उठा लाया. पिता के कहने से उसने उसे तोड़ा. उसके अंदर बहुत सारे छोटे छोटे बीज दिखाई दिए. पिता के कहने पर उसने फिर एक बीज को भी तोड़ा. क्या देखता है विनोदनायक, इस तोड़े हुए बीज के अंदर. कुछ भी तो नहीं दिख रहा है इसके अंदर, पिताजी. इसके अंदर से ही तो वत्स इतना विशाल वटवृक्ष बना है. हां, जिसके अंदर कुछ भी नहीं दिखता है, उसी में से तो. इस कुछ नहीं में ही सब कुछ समाया हुआ है, पर वह दिख नहीं रहा.

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अत्यंत सूक्ष्म है वह. स्थूल उसे पकड़ नहीं सकता. विनोदनायक आज रात एक कटोरी में पानी भर देना और उसमें नमक की एक डली डाल देना. विनोदनायक ने वैसा ही किया. दूसरे दिन प्रात: वेदप्रकाश ने पूछा देख नमक की वह डली कटोरी में कहां पड़ी हुई है. वह तो मुझे कहीं नहीं मिल रही है. कटोरी के नीचे के भाग से एक चम्मच पानी अपने मुंह में डालकर बता कि वह कैसा है. नमकीन है. पिताजी, मैं समझ गया कि वह डली कटोरी में सारे ही पानी में, नीचे के, बीच के और ऊपर के पानी में मिलकर एकाकार हो गई हैं. यह उसके स्वाद से मालूम हुआ, पर वह दिख नहीं रही है. वेदप्रकाश जो समझाना चाहता था उसे विनोदनायक समझ गया. नमक की डली नष्ट नहीं हुई थी.

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उसका केवल रूप बदल गया था. वेदप्रकाश बोले इस प्रकार वह सत्, जिससे यह सब कुछ बना है, देखने में नहीं आता, पर वह सभी वस्तुओं और प्राणियों में विद्यमान है. विनोदनायक, मुझे प्रसन्नता है कि तूने उस सत् के रहस्य को समझ लिया. इस प्रकार से विनोदनायक ने अपने पिता की आज्ञा मानकर , और वेदो का ज्ञान प्राप्त कर एक अच्छा और समझदार इंसान बन गया.

तो दोस्तों आपको वेदो की ये एक अनोखी कहानी कैसी लगी, इसके बारे में हमे जरूर बताये, साथ ही आप हमारी इस पोस्ट को लाइक और शेयर करना ना भूले. धन्यवाद्

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