किस्सा सच्ची घटना का

किस्सा सच्ची घटना का

Kissa sacchi ghatna ka motivational kahani in hindi

दोस्तों आज मैं आपको आपबीती एक सच्ची घटना सुनाने जा रही हूँ, लोग कहते है, भगवान है, पर कहाँ है, कोई नहीं जानता. हमको लगता है भगवान सजे-धजे सिल्क के कपडे पहन कर अचानक सामने प्रकट हो जायेंगे, ऐसा नहीं होता दोस्तों, वो तो किसी भी रूम में आकर आपकी मदद कर जाते है , और आपको मालूम भी नहीं चलता.तो सुनिए एक ऐसी सच्ची घटना जो मेरी आँखों है, ये आज से 4-5 साल पहले की बात है, जब में ट्रैन से दिल्ली से अहमदाबाद जा रही थी अपने एग्जाम के लिए. रात 11 बजे की ट्रैन थी, जाते टाइम तो सबने बड़ी केयर से ट्रैन में बिठा दिया और सुबह 8 बजे तो पहुंच ही जाना था, सब ठीक था , कुछ ही स्टेशन निकले थे, की अचनाक घर से कॉल आया की वापस आ जाओ घर पर कुछ प्रॉब्लम हो गई थी.घबराहट में मैंने स्टेशन भी नहीं देखा बस उतर गई.

रात के 2 बज रहे थे , डर भी लग रहा था , सब नया था स्टेशन भी , लोग भी, और जगह भी, कुछ समझ नहीं आ रहा था कहाँ जाना है, क्या करना है, एक तो एग्जाम की टेंशन और उप्पर से एक बैग ट्रैन में ही रह गया था, किसी ने ठीक ही कहाँ हैं, मुसीबत जब भी आती है चारो और से आती है, बहुत ढूंढने पर एक 1,000 का नोट मिला किताब के बीचो बीच, पैसे आये उसके बाद नज़र घुमा कर चारो तरफ देखा तो उत्तर प्रदेश का कोई स्टेशन था जहा में उतर गई थी, रात के 2 बजे. फिर क्या था , महिला वेटिंग हॉल में जाकर बैठ गई, क्योकि वहाँ से सुबह 4 बजे तक कोई ट्रैन नहीं थी वापस जाने के लिए, नींद नहीं आ रही थी, क्योकि डर लग रहा था , कहने को तो महिला वेटिंग थी, पर पुरुष भी आ-जा रहे थे वहाँ. सुबह के 4 बजने का इंतज़ार स्टार्ट कर दिया, रात बहुत लम्बी लग रही थी. वेट करते करते ३ बज गए , कई लोग आ रहे थे जा रहे थे, उनको देखने में आधा घंटा और निकल गया.

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बहुत लोगो ने पूछा भी, कहाँ जाना है, यहाँ अकेली क्यों बैठी हो, बाहर से बहुत हिम्मत दिखा कर बात तो कर रही थी में उन लोगो से, पर अंडर से बहुत डरी हुई थी. अनाउसमेंट हुआ की दिल्ली की ट्रैन 4 बजे तक स्टेशन पहुंच जाएगी, टिकट नहीं था. टिकट काउंटर पर बहुत भीड़ लग गई, कोई लोकल ट्रैन थी वो शायद. टिकट काउंटर के बाहर खड़े खड़े 15 मिनट हो गए , एक अंकल आये और बोले कहाँ जाना है, मेने बोला दिल्ली जाना हैं, वो बोले पैसे मुझे दे मैं टिकट लेकर आता हूँ, उनको 1,000 का नोट देना पढ़ा क्योकि चेंज नहीं था मेरे पास.बस फिर क्या एक नज़र उन अंकल पर और एक नज़र ट्रैन पर , 10 मिनट के बाद वो अंकल 175 रुपये की टिकट लेकर आये और बाकी का चेंज मुझे देते हुए बोले दिल्ली जा रही हो, मुझे भी गुडगाँव जाना हैं, कुछ टाइम साथ रहेंगे, टिकट लेकर आये बचा हुआ पैसा वापस भी दिया. थोड़ा विश्वास तो अंकल ने ले लिया था मेरा.

ट्रैन आ गई , आपस में बात-चीत हुई तो मालूम चला वो अंकल तो दूधिया थे. जो रोज़ सुबह सुबह दूध लेकर गुडगाँव जाते थे, हलकी हरे रंग की शर्ट और सफ़ेद पजामा पहने हुए वो अंकल और हां उन्होंने सर पर सफ़ेद कलर का कपड़ा लपेट रखा था. देखने में बिलकुल सिंपल , भगवन ने उन अंकल को मेरी हेल्प के लिए ही भेजा था. बातो से बहुत सरल लग रहे थे और बात करते टाइम मुझे ऐ लड़की बोल रहे थे, साथ में चाय भी पी हमने, ढेर सारी बाते की हमने,  फिर गुडगाँव स्टेशन आने पर मेने उन अंकल को बोला , आपका स्टेशन आ गया, मेरे सर पर हाथ फेर कर वो अंकल ट्रैन से नीचे उतर गए. अचानक कहाँ गायब हो गए मालूम ही नहीं चला, फिर मैं अपने स्टेशन पर पहुंची और फिर घर, पर समझ नहीं आया वो अंकल इंसान थे या भगवान का कोई रूप, तो दोस्तों ये का किस्सा एक सच्ची आप-बीती घटना का जो भुलाये नहीं भुलाई जाती.

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