जन्म और मृत्यु के बीच की अवस्थायें

जन्म और मृत्यु के बीच की अवस्थायें

Janam aur mrityu ke bich ki awasthaye hindi short stories

Short story hindi, क्या होता है जब एक इंसान मरता है और फिर से दोबारा जन्म लेता है. मरने और जन्म लेने की क्या क्या अवस्थायें होती है और किस तरह से इन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है , इसकी जानकारी हम आपको इस पोस्ट के माध्यम से देने जा रहे है.

ये है तीन अवस्थायें Ye hai tin awasthaye

1. जागृत अवस्था

अभी यह आलेख पढ़ रहे हो तो जागृत अवस्था में ही पढ़ रहे हो? ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है लेकिन अधिकतर लोग ठीक-ठीक वर्तमान में भी नहीं रहते. जागते हुए कल्पना और विचार में खोए रहना ही तो स्वप्न की अवस्था है. जब हम भविष्य की कोई योजना बना रहे होते हैं, तो वर्तमान में नहीं रहकर कल्पना-लोक में चले जाते हैं. कल्पना का यह लोक यथार्थ नहीं एक प्रकार का स्वप्न-लोक होता है.

जब हम अतीत की किसी याद में खो जाते हैं, तो हम स्मृति-लोक में चले जाते हैं. यह भी एक-दूसरे प्रकार का स्वप्न-लोक ही है. अधिकतर लोग स्वप्न लोक में जीकर ही मर जाते हैं, वे वर्तमान में अपने जीवन का सिर्फ 10 प्रतिशत ही जी पाते हैं, तो ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है.

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2. स्वप्न अवस्था

जागृति और निद्रा के बीच की अवस्था को स्वप्न अवस्था कहते हैं. निद्रा में डूब जाना अर्थात सुषुप्ति अवस्था कहलाती है. स्वप्न में व्यक्ति थोड़ा जागा और थोड़ा सोया रहता है. इसमें अस्पष्ट अनुभवों और भावों का घालमेल रहता है इसलिए व्यक्ति कब कैसे स्वप्न देख ले कोई भरोसा नहीं. यह ऐसा है कि भीड़भरे इलाके से सारी ट्रेफिक लाइटें और पुलिस को हटाकर स्ट्रीट लाइटें बंद कर देना.

ऐसे में व्यक्ति को झाड़ का हिलना भी भूत के होने को दर्शाएगा या रस्सी का हिलना सांप के पीछे लगने जैसा होगा. हमारे स्वप्न दिनभर के हमारे जीवन, विचार, भाव और सुख-दुख पर आधारित होते हैं. यह किसी भी तरह का संसार रच सकते हैं.

3. सुषुप्ति अवस्था

गहरी नींद को सुषुप्ति कहते हैं. इस अवस्था में पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां सहित चेतना (हम स्वयं) विश्राम करते हैं. पांच ज्ञानेंद्रियां- चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण और त्वचा. पांच कर्मेंन्द्रियां- वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ और पायु. सुषुप्ति की अवस्था चेतना की निष्क्रिय अवस्था है. यह अवस्था सुख-दुःख के अनुभवों से मुक्त होती है.

इस अवस्था में किसी प्रकार के कष्ट या किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं होता. इस अवस्था में न तो क्रिया होती है, न क्रिया की संभावना. मृत्यु काल में अधिकतर लोग इससे और गहरी अवस्था में चले जाते हैं.

कुछ अन्य अवस्थाये

1. तुरीय अवस्था

चेतना की चौथी अवस्था को तुरीय चेतना कहते हैं. यह अवस्था व्यक्ति के प्रयासों से प्राप्त होती है. चेतना की इस अवस्था का न तो कोई गुण है, न ही कोई रूप. यह निर्गुण है, निराकार है. इसमें न जागृति है, न स्वप्न और न सुषुप्ति. यह निर्विचार और अतीत व भविष्य की कल्पना से परे पूर्ण जागृति है. यह उस साफ और शांत जल की तरह है जिसका तल दिखाई देता है. तुरीय का अर्थ होता है चौथी.

इसके बारे में कुछ कहने की सुविधा के लिए इसे संख्या से संबोधित करते हैं. यह पारदर्शी कांच या सिनेमा के सफेद पर्दे की तरह है जिसके ऊपर कुछ भी प्रोजेक्ट नहीं हो रहा. जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि चेतनाएं तुरीय के पर्दे पर ही घटित होती हैं और जैसी घटित होती हैं, तुरीय चेतना उन्हें हू-ब-हू हमारे अनुभव को प्रक्षेपित कर देती है. यह आधार-चेतना है. यहीं से शुरू होती है आध्यात्मिक यात्रा, क्योंकि तुरीय के इस पार संसार के दुःख तो उस पार मोक्ष का आनंद होता है. बस, छलांग लगाने की जरूरत है.

2. तुरीयातीत अवस्था

तुरीय अवस्था के पार पहला कदम तुरीयातीत अनुभव का. यह अवस्था तुरीय का अनुभव स्थाई हो जाने के बाद आती है. चेतना की इसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को योगी या योगस्थ कहा जाता है. इस अवस्था में अधिष्ठित व्यक्ति निरंतर कर्म करते हुए भी थकता नहीं. इस अवस्था में काम और आराम एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं.

इस अवस्था को प्राप्त कर लिया, तो हो गए जीवन रहते जीवन-मुक्त. इस अवस्था में व्यक्ति को स्थूल शरीर या इंद्रियों की आवश्यकता नहीं रहती. वह इनके बगैर भी सबकुछ कर सकता है. चेतना की तुरीयातीत अवस्था को ही सहज-समाधि भी कहते हैं.

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3. भगवत चेतना

तुरीयातीत की अवस्था में रहते-रहते भगवत चेतना की अवस्था बिना किसी साधना के प्राप्त हो जाती है. इसके बाद का विकास सहज, स्वाभाविक और निस्प्रयास हो जाता है. इस अवस्था में व्यक्ति से कुछ भी छुपा नहीं रहता और वह संपूर्ण जगत को भगवान की सत्ता मानने लगता है. यह एक महान सिद्ध योगी की अवस्था है.

4. ब्राह्मी चेतना

भगवत चेतना के बाद व्यक्ति में ब्राह्मी चेतना का उदय होता है अर्थात कमल का पूर्ण रूप से खिल जाना. भक्त और भगवान का भेद मिट जाना. अहम् ब्रह्मास्मि और तत्वमसि अर्थात मैं ही ब्रह्म हूं और यह संपूर्ण जगत ही मुझे ब्रह्म नजर आता है. इस अवस्था को ही योग में समाधि की अवस्था कहा गया है. जीते-जी मोक्ष.

तो दोस्तों अब तो आपको जीवन और मृत्यु के बीच की कुछ कड़ियों के बारे में तो पता चल ही गया होगा. तो आपको हमारे ये पोस्ट जीवन – मृत्यु की कैसी लगी. इसके बारे में हमे जरूर बताये और साथ ही हमारी इस पोस्ट को लाइक और शेयर करना ना भूले. धन्यवाद्

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