मृत्यु का अंत नहीं होता

मृत्यु का अंत नहीं होता

Mrityu ka Anth Nahi hota true motivational stories in hindi

 

बहुत पुराणी बात हे. किसी सयाने ने सिकंदर को एक ऐसे झरने के बारे में बताया , जिसका पानी पीने से आदमी कभी नहीं मरता. बस उस दिन से सिकंदर की आँखों में झरने की तलाश ठाठे मारने लगी. दिन, महीने, साल भटकते-भटकते आखिर एक दिन उसकी तलाश पूरी हुई. झरना उसके सामने था. भय, रोमांच, कोतुहल और चमत्कार की आशा से भेरा सिकंदर जैसे ही पानी पीने के लिए झुका. एक आवाज़ आई , ‘रुको…’ जैसे ही सिकंदर ने चारो और देखा. ‘आस-पास कोई नहीं… न आदम , न आदम की जात. फिर आवाज़ कह से आ रही है’, सिकंदर ने सोचा. तभी उसकी नज़र कोने में गए. एक बूढ़ा, अशक्त कौआ जमीं पर बेसुध सा पड़ा था. ‘क्या इसी ने मुझे रोक ?’ सिकंदर कुछ पूछे इससे पहले ही कोई ने कह , ‘है मेने ही तुम्हे रोक था. में जनता हु की न जाने कितने दिन-रात खर्च करके तुम यहाँ ए हो.

सिर्फ इस पानी को पीने के लिए , जिसे अमरत्व का वरदान मिला है. में तुमसे तुम्हारी यह दुर्लभ उप्लभ्धि छीनना नहीं चाहता, पर इतना अवश्य बताना चाहता हु की जिसे तुम वरदान समझ रहे हो, वह दरअसल एक अभिसाप हे. आज से पाँच सो वर्ष पहले मेने भी अमर होने के लिए इस झरने का पानी पिया था. पहले-पहल मुझे लगा मेने मृत्यु को जीत लिया, लेकिन नही यह मेरी जीत नहीं, सबसे बड़ी हार थी. जीवन की हार. संघर्स की हार. आशा और भावनाओ की हार…. इतनी बड़ी हार झेलकर भी पाँच सो साल से में जी रहा हु, क्योंकि में मर नहीं सकता. में अमर हु, लेकिन यदि यही अमरत्व है, तो मृत्यु क्या है???

ऐसे समय में जहाँ विज्ञानं वयक्तिको अमर बनाने की मुहीम में जुटा है. सबसे एहम सवाल यही है की यदि अमरता भी एक सीमा के बाद मृत्यु दंश में बदल जाती हे, तो हीमे अमरत्व क्यों चाहिए? एज़रसिया बढ़ाकर हम किसे चिरायु बनाना चाहते हे? ओस टाइम को , जो अवसाद और आनंद के पैराडाक्स में जी रहा है? या उस जीव को, जिसका झुकाव सर्जन से ज्यादा विनास की और है? आत्म-पर ज्ञान-विज्ञानं, द्र्ष्टि-दर्शन, आगत-विगत… जीवन का कोई भी पक्ष हम ठीक से संभल नहीं सकते, मगर फिर भी कुढ़ को अक्षुण्ण बनाये रखना चाहते है. आखिर क्यों? अनवरत विनाश गाथाये लिखते इस टाइम की मुट्ठी में जबरन कुढ़ को छिपा लेने का तब-तक कोई अर्थ नहीं, जब-तक हम जीवन को सराहना , सेकरना न सिख जाये. गीता में कृष्ण का सन्देश याद है ‘न, अमृतं चेव मृत्युच्व…’ अथार्थ में ही अमृतं हु और में ही मृत्यु. सत-असत, भाव-आभाव, सर्जन-संहार सब में ही हूँ. मुझसे इतर कुछ नहीं.

मरता भी में हूँ और जनम भी में ही लेता हूँ. फिर किसका भय और केसा दुःख…? यकीन मानिये दुनिया में जादुई झरनों का अस्तित्व तभी तक है, जब तक मन में मृत्य का डर है. जिस दिन हम मृत्य के डर को छोड़कर लाइफ को सेलिब्रेट करना सिख जायेगे , उस दिन सही मायनो में अमरत्व हमारी मुट्ठी में होगा. नेशनल फुएन्रॉल डायरेक्टर्स एसोसिएशन का भी यही कहना है की ‘ फ्यूनरल (या अंतिम संस्कार) ऐसे होने चाहिए जो मृत्यु के दुःख को गधा करने के बजाए जीवन की याद दिलाये. इस लिहाज़ से यह फुएन्रॉल के फ्यूनरल का बिलकुल सही टाइम है, क्योंकि अब टाइम मृत्यु गंध से बहार निकालकर जीवन का उत्सव मनना चाहता है.’

वेसे अंत के अंत की सुरुआत हो चुकी है. खबर है की दुनिया के एक छोर पर लोग मृत्यु का शोक करने के स्थान पर जीवन का उत्सव मना रहे है. जिसे देखकर लगता है की अंत का अंत निकट है, लेकिन यह अंत सुखद होगा या मौत की यह मौत जीवन को नई दुखो में धेकेल देगी, देखना यही है….< यह है जीवन के आखिरी अध्याय की नई पटकथा….

मृत्यु की उपस्थिति सहज नहीं होती. बेहित भार होता है उन पालो में. अवयक्त भय, उदासी, तनाव और अवसाद के माहौल में सब कुछ छुटता नज़र आता है. बीतता दिखाई देता है. यू तो वर्तमान को अतीत होने में बस एक छन्न खर्च होता है. लेकिन उस एक छन में जब सांसे विदेह हो जाती है, संभावनाएं शून्य और भावनाये अश्रु… तब कोई कितना ही रोके. कुछ भी कह. मन बार-बार पीछे लौटता है. बार-बार एक आभाव महसूस करता है और बार-बार शोक करता है. कहते है की शमसान, कब्रिस्तान, चर्च और वे तेमाम स्थान – जहाँ देह की अंतिम क्रिया संपन्न होती है – इस शोक को और गहरा बनाती है, क्योंकि यहाँ परिवेश करते ही मन में वेरोगये जागने लगता है. वैराग्य … शमसान वैराग्य … जो एक झटके में सोच पर पेड़े माया के आवरण हटा देता है. तब जीवन के राग-रंग, नैतिक-अनैतिक, कर्म-अकर्म, पाप-पुण्य सब प्रश्नों में बदल जाते है और वयक्ति जीव के सत्य के प्रति चेतनए होता है.

सामान्यतय यह चेतन्यता उस सीमा से बहार निकलते ही छूठ जाती है और लोग वापस अपनी छल-परपंच, माया-मोह से भेरी दुनिया में दुब जाते है. मनो अंतिम यात्रा में शामिल होना एक केरतेवय था, या कोई भार जिसे उन्होंने उत्तर दिया. शेष सभी ससंस्कर या क्रियाए तो मर्त देह के लिए होती है. उनसे जीवित वयक्ति का क्या लेना-देना? लेकिन मृत्यु के साथ हर एक देश, जाती, धर्म में कुछ खाश कर्मकांड इसी वजह से जोड़े गए है. ताकि साथ आये लोग जान सके की सत्य क्या है और भरम क्या है? बंधन क्या है और मुक्ति क्या? साथ क्या जाता है और पीछे क्या छुटता है? तभी तो विदेशो में भी कह जाता है- ‘फ्यूनरल फॉर लिविंग विइंगस नॉट फॉर डेड…’

सही है न तो निष्प्राण देह को इससे कोई अंतर पड़ता है की उसे सुपुर्द-ऐ-खाक किया जा रहा है या चन्दन की लकडियो पैर लिटाया जा रहा है. न ही जन्नत-दोजख, मोह-मोक्ति, गॉड-एब्लिन का इससे कोई सीधा तालुक है. यह सब दुनियावी परपंच है. टाइम के एक छोर पर स्वीकार कर ली गए वयस्था… जिनका उद्देश्य पीछे रह जाने वालो को बस इतना समझना है की मृत्यु एक अनिवार्यता है और अनिवारयताओ को समग्र चेतना के साथ स्वीकार किया जाता है. इस स्वीकार में अंशु और अवसाद का कोई स्थान नहीं, लेकिन यह माया जगत है. जहाँ दुखी होना, अंशु बहाना भी एक अनिवारयेत है. जो इस अनिवार्यता को नहीं निभाना चाहते, बड़ी आसानी से समाज उन्हें पत्थरदिल कह देता है. शोक की जगह सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइफ को वरीयता देने के पीछे यही सोच है.

वे मृत्यु को नहीं जीवन को सेलिब्रेट करना चाहते है…

न ना… शोक के सापेक्ष जीवन-उत्सव को वरीयता देने वाली सोच को निस्ठुर मत समझिये. जितना नमक हमारे-आपके आंशुओ में है, यह सोच भी उतनी ही भावुक और संवेदनशील है. है, इसका सीधा सवाल है की अगर यादो को दोहराकर मृत्यु के भार को काम किया जा सकता है, तो क्या ऐसा करना उचित नहीं? उचित है. बिलकुल उचित है. बल्कि पुराने टाइम में मृत्यु के दौरान 13-14 दिन तक होने वाली बैठक का उदेस्ये यही तो था. जाने वाले की जीवन से जुडी बात करना.

उसके अछे-बुरे कामो को याद करना.आज हम जिसे सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइफ कह रहे है, कही न कही यह उसी पुरातन वयवस्था का परिवर्तित सुरूप है.अंतर बस इतना है की पहले शोकः प्रमुख था और अब सेलिब्रेशन… पहले विचार का केंद्र विराम था और अब गेती… पहले आगे फैली सुनियेटा को देखा जाता था, अब पीछे बिछे साहचर्य को तलाश जाता है. कुल मिलकर यह जीवन से भेरी सकारात्मक अप्प्रोच है, जो आरम्भ हो या अंत हर छन को उत्सव की तरह मनना चाहती है.

हलाकि इस तरह की सुगबुगाहट पहले भी होती रहती है, लेकिन इस बार यह भावना खुलकर प्रेतिध्यानदित हो रही है. बेशक इसका शरए बेबी बूमर्स यानि सेकंड विवशयुद्ध के बाद (1946-1964) जन्मी उस पीढ़ी को है, जिसके सदस्य वर्तमान में ५२ से ७० आयु के वर्ग के है. फूलण प्लानिंग सर्विस कंपनी के सी.इ.ओ. की मने तो फुनिराल इंडस्ट्री में क्रन्तिकारी बदलाव लेन के पीछे मूल रूप से बेबी बूमर्स है. जो नहीं चाहते की उनके न रहने पर शॉक का रंग (कला) पहना जाये. जीवन की तरह ये अपने अंत को भी एन्जॉय करना चाहते है. सो मोरन पार्टी दे रहे है. मनपसंद ताबूत चुन रहे है. डिज़ाइनर ड्रेस बनवा रहे है. फ्यूनरल पैर ऑडियो-विडियो सिस्टम के अरेजमेंट को वरीयता दे रहे है, ताकि लोग म्रतक के जीवन को जाने.

सामाजिक मनीषी और विचारको की नज़र में जिजीविषा और जीवितता से लबरेज़ सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइफ एक सकारत्मक पहल है, जिसका फोकस मृत्यु नहीं जीवन है. भावनाओ का क्रन्दन नहीं, यादो का आलोडन है. आभाव नहीं, वह भाव है, जो गुजरे पालो में हमने अपने सुजान के साथ बिताये थे. वस्तुतः यह दुःख की दिशा को सुख से जोड़ने का विचार है. बहुत कुछ किसी ठगपे रिवाइंड करने जैसा… जहाँ दुःख में दुबे लोग किसी कालपनिक डर की कलम से लिखा पुराण बांचने के स्थान पर साझा दिनों को याद करते है. प्रेम, विश्वास और सपनो को दोहराते है. धीरे-धीरे उन्हें एहसास होता है की कोई नहीं जय. हां एक लौकिक उपस्थिति सुनए जरूर हुई है, किन्तु प्रेम की, विश्वास की सहचर्ये की, समबनधो की ऊष्मा वही है. संभवतह आत्मा इसी ऊष्मा को कहते होंगे, जिसका कोई अंत नहीं. जिसे सतत प्रवाहित होना है, इस जीवन से उस जीवन तक…. इस कल से उस कल तक….

कही यह आत्मरति की नई राह तो नहीं?…

निश्चय ही अपने हाथ में कलम हो, तो क्यों कोई ज़िंदगी के पन्नो पर दुःख लिखेगा? दुःख को लिखा भी नहीं जाना चाहिए. किन्तु डर यही है की दुःख और भय से अनाशक्ति का यह अभ्यास कही जीवन को टॉम की तरह आत्ममुघ्दता, अहकेन्द्रिड़ता की और न ले जाये…. मार्क ट्वेन के ‘एडवेंचर ऑफ़ टॉम स्वायर’ में एक कहानी है. एक बार ग़लतफहमी वाश टॉम और उसके साथियो को मृत मान लिया जय. जिस टाइम लोग फुरनाल के लिए चर्च में जमा हुए, टॉम और उसके साथी भी वह पहुच गेये, मगर सामने आने के बजाय वह छिप कर लोगो की प्रितिक्रिया देखने लगे. सब लोग उन्हें याद केर रहे थे. उनसे जुडी छोटी-छोटी बाते दोहरा रहे थे. उनके लिए दुखी हो रहे थे. आंशू बह रहे थे. यह सब टॉम को एक अलग दुनिया में ले जय, जेह तमाम विचारो का केंद्र सिर्फ वह था. और कोई नहीं सिर्फ वह…. यह सर्वथा नया अनुभव था, जो तत्क्षण उसके जीवन का प्रौडस्ट मोमेंट बन जय.

क्योंकि जीवन यह ओतना सेलेब्रेट नहीं किया जाता, जितना मृत्यु को उपेक्षित किया जाता है. ऐसा करके हम न केवल मृत्यु की गंभीरता और निहितार्थ को समझने की मोके गेव देते है, बल्कि जीवन को सराहने की अवसर भी खो देते है. सेलिब्रेशन से तात्कालिक रहत मिल सकती है, लकिन स्थाई सुकून सत्य का बोध हो जाने पर ही संभव है. उस सत्य को स्वीकार लेने में है, जिस पर यह कथाकथिक उत्सवधर्मी एक भ्रम का आवरण दाल देते है, जबकि संसार की पृत्येक संस्कृति में मृत्यु का विचार जन्म के सापेक्ष चलता है.

बदल रहा है मौत को जीने का अंदाज़…

कल तक आफ्टर लाइफ ही उलझने वाला प्रश्न था. अब उसकी तैयारी उससे भी बेडा सवाल बन गयी है. बेबी बूमर्स की डिजिटली अवेयर पीढ़ी मृत्यु को भी नए अंदाज़ से जीना चाहती है. यही वजह है की सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइफ जैसे कांसेप्ट बेदी तेज़ी से चलन का हिस्सा बन रहे है. हज़ारो वेब्सीटेस, सेकड़ो लोगो ने मिलकर मृत्यु में सेलिब्रेशन के पल नहीं पूरी इंडस्ट्री तलाश ली है. कमर्शियल चार्ट्स की मने तो यह बढ़ती हुई इंडस्ट्री है. जेह लोग अपनी मृत्यु को सेलेब्रेट करने के लिए अपनी सुविधा और रूचि के अनुसार कोई भी पैकेज चुन सकते है.

बैंड्स, डांसर्स, थीम पार्टी, ऑडियो-विडियो प्रेजेटेशन्स, लघु जीवन व्रत, डिसिनेर कपडे एवेम ताबूत क्या-क्या उपलब्ध नहीं है. लकिन इस सबका उदेश्ये क्या है? पूछने पर आयोजक बताते है की सेलिब्रेशन में दुःख से ज्यादा सुख प्रतिध्वनि होता है. हमारे आज को इसी की ज्यादा ज़रूरत भी है. इसलिए लोग इसकी और आकर्षित है. एक प्रकार से यह अच्छी पहल है. बशर्ते यह दूसरे उत्सवों की तरह परदर्शन का थोथा जेरिया न बने. अन्यथा जो जकडन आज पारंपरिक कर्मकांड में नज़र आ रही है. कल वही इसकी नियति होगी.

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