मेहरगढ़ मैं बसा भूत

मेहरगढ़ मैं बसा भूत Mehargadh main basa bhoot

मैं अपने गांव की आज आपको एक अनोखी कहानी सुनाने जा रहा हु. मेरा नाम सुदेश है और मैं मेहरगढ़ का रहने वाला हु. मेरे गांव मैं एक बहुत ही बड़ा बागान है और वो लगभग 30-40 एकड़ मैं फैला हुआ है. इस बगीचे में आम और संतरे के पेड़ों की अधिकता है. बहुत सारे पेड़ों के गिर जाने के कारण , आज यह मेहरगढ़ अपना पहले वाला अस्तित्व खो चुकी है पर आज भी कमजोर दिलवाले व्यक्ति दोपहर या दिन डूबने के बाद इस मेहरगढ़ की ओर जाने की बात तो दूर इस का नाम उनके जेहन में आते ही उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं. आखिर क्यों. उस मेहरगढ़ में ऐसा क्या है. तो आज से 40-50 साल पहले यह मेहरगढ़ बहुत ही घनी और भयानक हुआ करती थी. दोपहर के समय भी इस मेहरगढ़ में अंधेरा और भूतों का खौफ छाया रहता था. लोग आम तोड़ने के लिए दल बाँधकर ही इस मेहरगढ़ में जाया करते थे.

कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि रात को भूत प्रेतों को यहाँ कबड्डी खेलते हुए देखा जा सकता था. अगर कोई व्यक्ति भूला भटककर इस बारी के आस पास भी पहुँच गया तो ये भूत उसे भी पकड़कर अपने साथ खेलने के लिए मजबूर करते थे और ना करने पर जमकर धुनाई भी कर देते थे. उस व्यक्ति को तब छोड़ते थे जब वह कबूल करता था कि वह भाँग गाँजा आदि उन लोगों को भेंट करेगा. उस बगीचे में मेरे भी बहुत सारे पेड़ हुआ करते थे. एक बार हमारे काका जी ने आम के मौसम में आमों की रखवारी का जिम्मा गाँव के ही एक व्यक्ति को दे दी थी. लेकिन कहीं से काका जी को पता चला कि वह रखवार ही रात को एक दो लोगों के साथ मिलकर आम तोड़ लेता है. एक दिन हमारे काका जी ने छिपकर सही और गलत का पता लगने की सोची.

रात को खा पीकर एक लाठी और बैटरी लेकर हमारे काका जी उस भयानक और भूतों के साम्राज्य वाले बारी में पहुँचे. उनको कोने वाला पेड़ के नीचे एक व्यक्ति दिखाई दिया. काका जी को लगा कि यही वह व्यक्ति है जो आम तोड़ लेता है. काका जी ने आव देखा न ताव, उस व्यक्ति को पकड़ने के लिए लगे दौड़ने. वह व्यक्ति लगा भागने. काका जी उसे दौड़ा रहे थे और चिल्ला रहे थे कि आज तुमको पकड़कर ही रहुँगा. भाग देखता हूँ कि कितना भागता है. अचानक वह व्यक्ति उस बारी में ही स्थित एक बर के पेड़ के पास पहुँचकर भयंकर और विकराल रूप में आ गया. उसके अगल बगल में आग उठने लगी. अब तो हमारे काका जी को काठ हो गए और बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया. उनका शरीर काँपने लगा, रोएँ खड़े हो गए और वे एक दम अवाक हो गए.

अब उनकी हिम्मत जवाब देते जा रही थी और उनके पैर ना आगे जा रहे थे ना पीछे. लगभग दो तीन मिनट तक बेसुध खड़ा रहने के बाद थोड़ी सी हिम्मत करके हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए वे धीरे-धीरे पीछे हटने लगे. जब वे घर पहुँचे तो उनके शरीर से आग निकल रही थी. वे बहुत ही सहमे हुए थे. 4-5 दिन बिस्तर पर पड़े रहे तब जाकर उनको आराम हुआ. उस साल हमारे काका जी ने फिर अकेले उस मेहरगढ़ की ओर न जाने की कसम खा ली. वो एक बार अपनी लाइफ मैं बड़ी गलती कर चुके थे, लेकिन अब वो ऐसा नहीं करना चाहते थे.

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